21 जुलाई 2026
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अपार आईडी पर सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला: CBSE को देशभर में 'ऑप्ट-आउट' विकल्प लागू करने का निर्देश

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अपार आईडी पर सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला: CBSE को देशभर में 'ऑप्ट-आउट' विकल्प लागू करने का निर्देश

सारांश

सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि CBSE को अपार आईडी सहमति फॉर्म में 'ऑप्ट-आउट' का विकल्प देशभर में लागू करना होगा। ओडिशा उच्च न्यायालय के आदेश को राष्ट्रीय स्तर पर विस्तार देने की यह पहल बच्चों की निजता और डेटा सुरक्षा के लिए एक महत्वपूर्ण न्यायिक हस्तक्षेप है।

मुख्य बातें

सर्वोच्च न्यायालय ने 20 जुलाई 2026 को CBSE को अपार आईडी सहमति फॉर्म में 'ऑप्ट-आउट' विकल्प स्पष्ट रूप से शामिल करने का निर्देश देने की घोषणा की।
ओडिशा उच्च न्यायालय का दिसंबर 2025 का आदेश — जिसे चुनौती नहीं दी गई — अब पूरे देश में लागू किया जाएगा।
CBSE के सर्कुलर डिजिटल पर्सनल डेटा प्रोटेक्शन (DPDP) अधिनियम, 2023 के अधीन होंगे।
वरिष्ठ अधिवक्ता इंदिरा जयसिंह ने तर्क दिया कि अपार-आधार की अनिवार्य कड़ी शिक्षा के संवैधानिक अधिकार का उल्लंघन है।
याचिका में अनुच्छेद 21 और 21-क के तहत निजता व शिक्षा के मौलिक अधिकारों के उल्लंघन का आरोप लगाया गया है।
न्यायालय ने CBSE को डेटा सुरक्षा संबंधी मुद्दों की जाँच का भी निर्देश दिया।

सर्वोच्च न्यायालय ने 20 जुलाई 2026 को स्पष्ट किया कि वह केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड (CBSE) को निर्देश देगा कि अपार (ऑटोमेटेड परमानेंट एकेडमिक अकाउंट रजिस्ट्री) आईडी के सहमति फॉर्म में माता-पिता के लिए 'ऑप्ट-आउट' का विकल्प स्पष्ट रूप से शामिल किया जाए। यह निर्देश ओडिशा उच्च न्यायालय के उस आदेश को राष्ट्रीय स्तर पर लागू करने के लिए दिया जाएगा, जिसे अब तक चुनौती नहीं दी गई है।

मामले की पृष्ठभूमि

भारत के मुख्य न्यायाधीश सूर्य कांत और जस्टिस जॉयमाल्य बागची एवं जस्टिस वी. मोहना की तीन सदस्यीय पीठ चार छात्रों के माता-पिता द्वारा दायर एक रिट याचिका पर सुनवाई कर रही थी। याचिका में अपार आईडी योजना की संवैधानिक वैधता को चुनौती दी गई थी और बोर्ड परीक्षा पंजीकरण के लिए इसे अनिवार्य बनाने के CBSE के निर्णय पर सवाल उठाए गए थे।

गौरतलब है कि दिसंबर 2025 में ओडिशा उच्च न्यायालय ने पाया था कि अपार पहल को आधिकारिक तौर पर स्वैच्छिक बताया जाता है, लेकिन मॉडल सहमति फॉर्म में माता-पिता को शुरुआत से ही सहमति न देने का विकल्प उपलब्ध नहीं था। जस्टिस शशिकांत मिश्रा की एकल-न्यायाधीश पीठ ने कहा था कि स्पष्ट 'ऑप्ट-आउट' प्रावधान के अभाव में योजना की स्वैच्छिक प्रकृति कमज़ोर होती है और अधिकारियों को फॉर्म में संशोधन का निर्देश दिया था।

सुप्रीम कोर्ट का रुख

सुनवाई के दौरान पीठ ने कहा, 'हम CBSE को निर्देश देंगे कि वह इस फैसले को पूरे देश में लागू करे, क्योंकि ओडिशा उच्च न्यायालय के आदेश को स्वीकार कर लिया गया है। हम CBSE को इन मुद्दों की जाँच करने का भी निर्देश दे रहे हैं।' पीठ ने यह भी स्पष्ट किया कि CBSE के सर्कुलर डिजिटल पर्सनल डेटा प्रोटेक्शन (DPDP) अधिनियम, 2023 के अधीन होंगे और योजना को मौजूदा कानूनी ढाँचे के अनुसार ही संचालित करना होगा।

याचिकाकर्ताओं के तर्क

याचिकाकर्ताओं की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता इंदिरा जयसिंह ने तर्क दिया कि अपार आईडी आधार से जुड़ी होने के कारण छात्रों को व्यवहार में आधार लेने के लिए बाध्य करती है। उन्होंने कहा, 'शिक्षा का अधिकार कोई टारगेटेड सर्विस नहीं है — यह एक संवैधानिक अधिकार है। इसलिए परीक्षा में बैठने के लिए किसी बच्चे से आधार और अपार माँगना संविधान के विरुद्ध है।'

याचिका में यह भी आरोप लगाया गया है कि यह योजना संविधान के अनुच्छेद 21 और अनुच्छेद 21-क के तहत निजता, शिक्षा और निर्णय की स्वायत्तता के मौलिक अधिकारों का उल्लंघन करती है। इसके अलावा याचिका में यह भी कहा गया है कि यह योजना सर्वोच्च न्यायालय के के.एस. पुट्टास्वामी निजता निर्णय में निर्धारित कानूनी वैधता, आवश्यकता और आनुपातिकता के मानकों पर खरी नहीं उतरती।

डेटा सुरक्षा की चिंताएँ

याचिका में बच्चों के व्यक्तिगत डेटा को एकत्र करने, संग्रहीत करने और प्रोसेस करने को लेकर गंभीर चिंताएँ जताई गई हैं। यह तर्क दिया गया है कि अपार एक ऐसी केंद्रीकृत डिजिटल संरचना बनाता है जो छात्रों की दीर्घकालिक ट्रैकिंग और प्रोफाइलिंग को संभव बनाती है — जो 'जन्म से करियर तक' की डिजिटल पहचान के रूप में 'भूल जाने के अधिकार' का उल्लंघन है। याचिका में DPDP अधिनियम के सख्त अनुपालन की माँग भी की गई है।

आगे की राह

सर्वोच्च न्यायालय अब CBSE को औपचारिक निर्देश जारी करेगा, जिसके तहत बोर्ड को ओडिशा उच्च न्यायालय के आदेश के अनुरूप सहमति फॉर्म में संशोधन कर देशभर में लागू करना होगा। यह मामला ऐसे समय में सामने आया है जब भारत में बच्चों के डेटा संरक्षण और डिजिटल पहचान की अनिवार्यता को लेकर व्यापक बहस जारी है। अगली सुनवाई में न्यायालय द्वारा CBSE की अनुपालन रिपोर्ट की समीक्षा अपेक्षित है।

संपादकीय दृष्टिकोण

'स्वैच्छिक' और 'अनिवार्य' के बीच की रेखा धुँधली बनी रहेगी।
RashtraPress
21 जुलाई 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

अपार आईडी क्या है और यह विवाद क्यों है?
अपार (ऑटोमेटेड परमानेंट एकेडमिक अकाउंट रजिस्ट्री) एक आधार-आधारित आजीवन शैक्षणिक पहचान संख्या है जो छात्रों के शैक्षणिक रिकॉर्ड को केंद्रीय रूप से संग्रहीत करती है। विवाद इसलिए है क्योंकि इसे आधिकारिक तौर पर स्वैच्छिक बताया गया है, लेकिन बोर्ड परीक्षा पंजीकरण के लिए इसे आवश्यक बनाने से यह व्यवहार में अनिवार्य हो जाती है।
सुप्रीम कोर्ट ने CBSE को क्या निर्देश देने की बात कही है?
सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि वह CBSE को ओडिशा उच्च न्यायालय के दिसंबर 2025 के आदेश को देशभर में लागू करने का निर्देश देगा, जिसके तहत अपार आईडी के सहमति फॉर्म में 'ऑप्ट-आउट' का स्पष्ट विकल्प शामिल करना अनिवार्य होगा। साथ ही CBSE को डेटा सुरक्षा संबंधी मुद्दों की जाँच का भी निर्देश दिया जाएगा।
ओडिशा उच्च न्यायालय ने इस मामले में क्या कहा था?
दिसंबर 2025 में जस्टिस शशिकांत मिश्रा की एकल-न्यायाधीश पीठ ने पाया कि मॉडल सहमति फॉर्म में माता-पिता को 'ऑप्ट-आउट' का विकल्प नहीं दिया गया था, जिससे योजना की स्वैच्छिक प्रकृति कमज़ोर होती है। उन्होंने अधिकारियों को फॉर्म में संशोधन कर स्पष्ट 'ऑप्ट-आउट' प्रावधान जोड़ने का निर्देश दिया था।
याचिकाकर्ताओं ने अपार-आधार की अनिवार्यता पर क्या आपत्ति जताई है?
वरिष्ठ अधिवक्ता इंदिरा जयसिंह ने तर्क दिया कि अपार आधार से जुड़ी होने के कारण छात्रों को परोक्ष रूप से आधार लेने के लिए बाध्य किया जाता है, जो शिक्षा के संवैधानिक अधिकार (अनुच्छेद 21-क) का उल्लंघन है। याचिका में यह भी कहा गया है कि यह योजना के.एस. पुट्टास्वामी निजता निर्णय के मानकों पर खरी नहीं उतरती।
DPDP अधिनियम 2023 का इस मामले से क्या संबंध है?
सर्वोच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया कि CBSE के सर्कुलर डिजिटल पर्सनल डेटा प्रोटेक्शन (DPDP) अधिनियम, 2023 के अधीन होंगे। याचिका में माँग की गई है कि बच्चों के डेटा के संग्रह, भंडारण और प्रसंस्करण में इस अधिनियम का सख्ती से पालन किया जाए।
राष्ट्र प्रेस
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