अपार आईडी पर सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला: CBSE को देशभर में 'ऑप्ट-आउट' विकल्प लागू करने का निर्देश
सारांश
मुख्य बातें
सर्वोच्च न्यायालय ने 20 जुलाई 2026 को स्पष्ट किया कि वह केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड (CBSE) को निर्देश देगा कि अपार (ऑटोमेटेड परमानेंट एकेडमिक अकाउंट रजिस्ट्री) आईडी के सहमति फॉर्म में माता-पिता के लिए 'ऑप्ट-आउट' का विकल्प स्पष्ट रूप से शामिल किया जाए। यह निर्देश ओडिशा उच्च न्यायालय के उस आदेश को राष्ट्रीय स्तर पर लागू करने के लिए दिया जाएगा, जिसे अब तक चुनौती नहीं दी गई है।
मामले की पृष्ठभूमि
भारत के मुख्य न्यायाधीश सूर्य कांत और जस्टिस जॉयमाल्य बागची एवं जस्टिस वी. मोहना की तीन सदस्यीय पीठ चार छात्रों के माता-पिता द्वारा दायर एक रिट याचिका पर सुनवाई कर रही थी। याचिका में अपार आईडी योजना की संवैधानिक वैधता को चुनौती दी गई थी और बोर्ड परीक्षा पंजीकरण के लिए इसे अनिवार्य बनाने के CBSE के निर्णय पर सवाल उठाए गए थे।
गौरतलब है कि दिसंबर 2025 में ओडिशा उच्च न्यायालय ने पाया था कि अपार पहल को आधिकारिक तौर पर स्वैच्छिक बताया जाता है, लेकिन मॉडल सहमति फॉर्म में माता-पिता को शुरुआत से ही सहमति न देने का विकल्प उपलब्ध नहीं था। जस्टिस शशिकांत मिश्रा की एकल-न्यायाधीश पीठ ने कहा था कि स्पष्ट 'ऑप्ट-आउट' प्रावधान के अभाव में योजना की स्वैच्छिक प्रकृति कमज़ोर होती है और अधिकारियों को फॉर्म में संशोधन का निर्देश दिया था।
सुप्रीम कोर्ट का रुख
सुनवाई के दौरान पीठ ने कहा, 'हम CBSE को निर्देश देंगे कि वह इस फैसले को पूरे देश में लागू करे, क्योंकि ओडिशा उच्च न्यायालय के आदेश को स्वीकार कर लिया गया है। हम CBSE को इन मुद्दों की जाँच करने का भी निर्देश दे रहे हैं।' पीठ ने यह भी स्पष्ट किया कि CBSE के सर्कुलर डिजिटल पर्सनल डेटा प्रोटेक्शन (DPDP) अधिनियम, 2023 के अधीन होंगे और योजना को मौजूदा कानूनी ढाँचे के अनुसार ही संचालित करना होगा।
याचिकाकर्ताओं के तर्क
याचिकाकर्ताओं की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता इंदिरा जयसिंह ने तर्क दिया कि अपार आईडी आधार से जुड़ी होने के कारण छात्रों को व्यवहार में आधार लेने के लिए बाध्य करती है। उन्होंने कहा, 'शिक्षा का अधिकार कोई टारगेटेड सर्विस नहीं है — यह एक संवैधानिक अधिकार है। इसलिए परीक्षा में बैठने के लिए किसी बच्चे से आधार और अपार माँगना संविधान के विरुद्ध है।'
याचिका में यह भी आरोप लगाया गया है कि यह योजना संविधान के अनुच्छेद 21 और अनुच्छेद 21-क के तहत निजता, शिक्षा और निर्णय की स्वायत्तता के मौलिक अधिकारों का उल्लंघन करती है। इसके अलावा याचिका में यह भी कहा गया है कि यह योजना सर्वोच्च न्यायालय के के.एस. पुट्टास्वामी निजता निर्णय में निर्धारित कानूनी वैधता, आवश्यकता और आनुपातिकता के मानकों पर खरी नहीं उतरती।
डेटा सुरक्षा की चिंताएँ
याचिका में बच्चों के व्यक्तिगत डेटा को एकत्र करने, संग्रहीत करने और प्रोसेस करने को लेकर गंभीर चिंताएँ जताई गई हैं। यह तर्क दिया गया है कि अपार एक ऐसी केंद्रीकृत डिजिटल संरचना बनाता है जो छात्रों की दीर्घकालिक ट्रैकिंग और प्रोफाइलिंग को संभव बनाती है — जो 'जन्म से करियर तक' की डिजिटल पहचान के रूप में 'भूल जाने के अधिकार' का उल्लंघन है। याचिका में DPDP अधिनियम के सख्त अनुपालन की माँग भी की गई है।
आगे की राह
सर्वोच्च न्यायालय अब CBSE को औपचारिक निर्देश जारी करेगा, जिसके तहत बोर्ड को ओडिशा उच्च न्यायालय के आदेश के अनुरूप सहमति फॉर्म में संशोधन कर देशभर में लागू करना होगा। यह मामला ऐसे समय में सामने आया है जब भारत में बच्चों के डेटा संरक्षण और डिजिटल पहचान की अनिवार्यता को लेकर व्यापक बहस जारी है। अगली सुनवाई में न्यायालय द्वारा CBSE की अनुपालन रिपोर्ट की समीक्षा अपेक्षित है।