संदीप सिकंद का रोहित रॉय के 'कूड़ेदान' बयान पर जवाब: हिंदी टीवी को आत्ममंथन की ज़रूरत
सारांश
मुख्य बातें
टेलीविजन निर्माता संदीप सिकंद ने अभिनेता रोहित रॉय के उस विवादास्पद बयान पर अपनी प्रतिक्रिया दी है, जिसमें रॉय ने टेलीविजन को 'डस्टबिन मीडियम' यानी 'कूड़ेदान जैसा माध्यम' बताया था। सिकंद ने 18 सितंबर 2026 को मुंबई में हुई एक बातचीत में स्पष्ट किया कि वह रोहित के शब्दों से सहमत नहीं हैं, लेकिन उनके पीछे छिपी भावना को नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता।
संदीप सिकंद की प्रतिक्रिया
सिकंद ने कहा, 'मैं रोहित रॉय के इस्तेमाल किए गए शब्दों से बिल्कुल सहमत नहीं हूं, लेकिन मुझे लगता है कि वह कहना यह चाह रहे थे कि आज जिस तरह के शोज बनाए जा रहे हैं, वे उस स्तर के नहीं हैं, जिस स्तर के होने चाहिए। इस भावना से मैं पूरी तरह सहमत हूं।' उन्होंने आगे जोड़ा कि अगर रॉय ने इस माध्यम को 'कूड़ेदान' कहा है, तो इंडस्ट्री को खुद से यह सवाल पूछना चाहिए कि आखिर टेलीविजन की हालत इतनी खराब क्यों हो गई।
टीवी की गिरावट के लिए पूरा तंत्र जिम्मेदार
सिकंद ने यह भी साफ किया कि टेलीविजन पर दिखाई जाने वाली चीज़ें अचानक नहीं बनी हैं। उनके अनुसार, 'जो शोज बनाए जा रहे हैं, जो सीरियल प्रसारित हो रहे हैं और जिन किरदारों को दर्शकों के सामने लाया जा रहा है, वे उसी व्यवस्था का नतीजा हैं, जिसे टेलीविजन की दुनिया ने मिलकर बनाया है।' यह टिप्पणी इंडस्ट्री की सामूहिक जिम्मेदारी की ओर इशारा करती है।
गौरतलब है कि हिंदी टेलीविजन की रेटिंग और दर्शकों की संख्या पर ओटीटी प्लेटफॉर्म के बढ़ते प्रभाव का असर पहले से ही चर्चा में रहा है। यह ऐसे समय में आया है जब इंडस्ट्री पहले से ही कंटेंट की गुणवत्ता और दर्शकों की घटती दिलचस्पी को लेकर दबाव में है।
मौलिक कहानियों की ज़रूरत
सिकंद ने हिंदी टीवी पर दूसरी भाषाओं के लोकप्रिय शोज की रीमेक बनाने की बढ़ती प्रवृत्ति पर भी सवाल उठाए। उन्होंने कहा, 'दूसरे क्षेत्रों के लोकप्रिय शोज बार-बार हिंदी में बनाने के बजाय मौलिक कहानियों पर ध्यान देना जरूरी है। हर कहानी का दोबारा निर्माण नहीं किया जा सकता और एक समय ऐसा आएगा, जब नए विषयों की ज़रूरत महसूस होगी।' उनके अनुसार, कहानी कहने के तरीके पर तत्काल ध्यान देना ज़रूरी है, अन्यथा स्थिति और बिगड़ सकती है।
रोहित रॉय का विवादास्पद बयान
अभिनेता रोहित रॉय ने हाल ही में एक बातचीत के दौरान टेलीविजन को 'डस्टबिन मीडियम' बताया था और इसकी तुलना ऐसे अखबार से की थी, जिसे पढ़ने के बाद लोग जल्दी भूल जाते हैं। उन्होंने यह भी कहा था कि उन्हें डर लगता है कि उनकी यह बात 'एहसानफरामोश' जैसी न लगे, क्योंकि टेलीविजन ने ही उन्हें स्टारडम दिया है। इस बयान के बाद टीवी इंडस्ट्री में व्यापक बहस शुरू हो गई थी।
आगे की राह
संदीप सिकंद का मानना है कि 'कूड़ेदान' शब्द निश्चित तौर पर सही नहीं है, लेकिन हिंदी टेलीविजन की मौजूदा स्थिति पर गंभीरता से सोचने की ज़रूरत है। इंडस्ट्री को यह तय करना होगा कि वह रेटिंग की दौड़ में कंटेंट की गुणवत्ता से समझौता करती रहेगी या दर्शकों के भरोसे को फिर से जीतने के लिए मौलिक और बेहतर कहानियाँ गढ़ेगी।