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संदीप सिकंद का रोहित रॉय के 'कूड़ेदान' बयान पर जवाब: हिंदी टीवी को आत्ममंथन की ज़रूरत

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संदीप सिकंद का रोहित रॉय के 'कूड़ेदान' बयान पर जवाब: हिंदी टीवी को आत्ममंथन की ज़रूरत

सारांश

अभिनेता रोहित रॉय के 'डस्टबिन मीडियम' बयान ने हिंदी टीवी में बड़ी बहस छेड़ दी। निर्माता संदीप सिकंद ने शब्दों को गलत बताया, लेकिन माना कि कहानी का स्तर गिर रहा है और इंडस्ट्री को मौलिक कंटेंट की ओर लौटना होगा।

मुख्य बातें

निर्माता संदीप सिकंद ने रोहित रॉय के 'डस्टबिन मीडियम' शब्दों को गलत बताया, लेकिन उनकी भावना से सहमति जताई।
सिकंद के अनुसार हिंदी टीवी की गिरावट पूरे तंत्र की सामूहिक ज़िम्मेदारी है, किसी एक की नहीं।
उन्होंने दूसरी भाषाओं के शोज की रीमेक बनाने की बजाय मौलिक कहानियों पर ज़ोर देने की माँग की।
रोहित रॉय ने टेलीविजन की तुलना उस अखबार से की थी जिसे पढ़ने के बाद लोग जल्दी भूल जाते हैं।
इंडस्ट्री विशेषज्ञों का मानना है कि ओटीटी के बढ़ते दबाव के बीच हिंदी टीवी को कंटेंट सुधार की सख्त ज़रूरत है।

टेलीविजन निर्माता संदीप सिकंद ने अभिनेता रोहित रॉय के उस विवादास्पद बयान पर अपनी प्रतिक्रिया दी है, जिसमें रॉय ने टेलीविजन को 'डस्टबिन मीडियम' यानी 'कूड़ेदान जैसा माध्यम' बताया था। सिकंद ने 18 सितंबर 2026 को मुंबई में हुई एक बातचीत में स्पष्ट किया कि वह रोहित के शब्दों से सहमत नहीं हैं, लेकिन उनके पीछे छिपी भावना को नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता।

संदीप सिकंद की प्रतिक्रिया

सिकंद ने कहा, 'मैं रोहित रॉय के इस्तेमाल किए गए शब्दों से बिल्कुल सहमत नहीं हूं, लेकिन मुझे लगता है कि वह कहना यह चाह रहे थे कि आज जिस तरह के शोज बनाए जा रहे हैं, वे उस स्तर के नहीं हैं, जिस स्तर के होने चाहिए। इस भावना से मैं पूरी तरह सहमत हूं।' उन्होंने आगे जोड़ा कि अगर रॉय ने इस माध्यम को 'कूड़ेदान' कहा है, तो इंडस्ट्री को खुद से यह सवाल पूछना चाहिए कि आखिर टेलीविजन की हालत इतनी खराब क्यों हो गई।

टीवी की गिरावट के लिए पूरा तंत्र जिम्मेदार

सिकंद ने यह भी साफ किया कि टेलीविजन पर दिखाई जाने वाली चीज़ें अचानक नहीं बनी हैं। उनके अनुसार, 'जो शोज बनाए जा रहे हैं, जो सीरियल प्रसारित हो रहे हैं और जिन किरदारों को दर्शकों के सामने लाया जा रहा है, वे उसी व्यवस्था का नतीजा हैं, जिसे टेलीविजन की दुनिया ने मिलकर बनाया है।' यह टिप्पणी इंडस्ट्री की सामूहिक जिम्मेदारी की ओर इशारा करती है।

गौरतलब है कि हिंदी टेलीविजन की रेटिंग और दर्शकों की संख्या पर ओटीटी प्लेटफॉर्म के बढ़ते प्रभाव का असर पहले से ही चर्चा में रहा है। यह ऐसे समय में आया है जब इंडस्ट्री पहले से ही कंटेंट की गुणवत्ता और दर्शकों की घटती दिलचस्पी को लेकर दबाव में है।

मौलिक कहानियों की ज़रूरत

सिकंद ने हिंदी टीवी पर दूसरी भाषाओं के लोकप्रिय शोज की रीमेक बनाने की बढ़ती प्रवृत्ति पर भी सवाल उठाए। उन्होंने कहा, 'दूसरे क्षेत्रों के लोकप्रिय शोज बार-बार हिंदी में बनाने के बजाय मौलिक कहानियों पर ध्यान देना जरूरी है। हर कहानी का दोबारा निर्माण नहीं किया जा सकता और एक समय ऐसा आएगा, जब नए विषयों की ज़रूरत महसूस होगी।' उनके अनुसार, कहानी कहने के तरीके पर तत्काल ध्यान देना ज़रूरी है, अन्यथा स्थिति और बिगड़ सकती है।

रोहित रॉय का विवादास्पद बयान

अभिनेता रोहित रॉय ने हाल ही में एक बातचीत के दौरान टेलीविजन को 'डस्टबिन मीडियम' बताया था और इसकी तुलना ऐसे अखबार से की थी, जिसे पढ़ने के बाद लोग जल्दी भूल जाते हैं। उन्होंने यह भी कहा था कि उन्हें डर लगता है कि उनकी यह बात 'एहसानफरामोश' जैसी न लगे, क्योंकि टेलीविजन ने ही उन्हें स्टारडम दिया है। इस बयान के बाद टीवी इंडस्ट्री में व्यापक बहस शुरू हो गई थी।

आगे की राह

संदीप सिकंद का मानना है कि 'कूड़ेदान' शब्द निश्चित तौर पर सही नहीं है, लेकिन हिंदी टेलीविजन की मौजूदा स्थिति पर गंभीरता से सोचने की ज़रूरत है। इंडस्ट्री को यह तय करना होगा कि वह रेटिंग की दौड़ में कंटेंट की गुणवत्ता से समझौता करती रहेगी या दर्शकों के भरोसे को फिर से जीतने के लिए मौलिक और बेहतर कहानियाँ गढ़ेगी।

संपादकीय दृष्टिकोण

लेकिन संदीप सिकंद की प्रतिक्रिया असल सवाल उठाती है — क्या हिंदी टेलीविजन इंडस्ट्री रेटिंग की होड़ में कंटेंट की बलि देती आई है? ओटीटी प्लेटफॉर्म के उभार के बाद से टीवी सीरियल की औसत गुणवत्ता पर सवाल लगातार उठ रहे हैं, फिर भी सुधार की दिशा में ठोस कदम नहीं दिखे। दूसरी भाषाओं के शोज की रीमेक पर अत्यधिक निर्भरता इंडस्ट्री की रचनात्मक कमज़ोरी को उजागर करती है। जब तक चैनल, निर्माता और लेखक मिलकर मौलिकता को प्राथमिकता नहीं देते, 'कूड़ेदान' जैसे बयान विवाद तो पैदा करते रहेंगे, पर बदलाव नहीं लाएंगे।
RashtraPress
18 सितंबर 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

रोहित रॉय ने टेलीविजन को 'कूड़ेदान' क्यों कहा?
रोहित रॉय ने एक बातचीत में टेलीविजन को 'डस्टबिन मीडियम' बताया और इसकी तुलना उस अखबार से की जिसे पढ़ने के बाद लोग जल्दी भूल जाते हैं। उनका मतलब था कि टीवी की रचनात्मकता और प्रभाव में गिरावट आई है।
संदीप सिकंद ने रोहित रॉय के बयान पर क्या कहा?
संदीप सिकंद ने कहा कि वह 'कूड़ेदान' शब्द से सहमत नहीं हैं, लेकिन इस बयान के पीछे की भावना — यानी हिंदी टीवी सीरियल की गुणवत्ता में गिरावट — से पूरी तरह सहमत हैं। उन्होंने इंडस्ट्री से आत्ममंथन की अपील की।
हिंदी टेलीविजन की गुणवत्ता क्यों गिर रही है?
संदीप सिकंद के अनुसार, हिंदी टेलीविजन पर दिखाए जाने वाले शोज और किरदार उस पूरे तंत्र का नतीजा हैं जिसे इंडस्ट्री ने मिलकर बनाया है। इसके अलावा दूसरी भाषाओं के शोज की रीमेक पर अत्यधिक निर्भरता भी मौलिकता की कमी का बड़ा कारण है।
क्या हिंदी टीवी पर रीमेक शोज का चलन समस्या है?
सिकंद ने इसे एक बड़ी समस्या बताया। उनका कहना है कि हर कहानी का दोबारा निर्माण नहीं किया जा सकता और एक वक्त ऐसा आएगा जब नए और मौलिक विषयों की ज़रूरत अनिवार्य हो जाएगी।
इस विवाद का हिंदी टीवी इंडस्ट्री पर क्या असर होगा?
यह बयान और उस पर हुई बहस इंडस्ट्री के भीतर कंटेंट की गुणवत्ता को लेकर चल रही बड़ी बहस का हिस्सा है। विशेषज्ञों का मानना है कि ओटीटी के बढ़ते दबाव में हिंदी टीवी को टिके रहने के लिए मौलिक और बेहतर कहानियाँ गढ़नी होंगी।
राष्ट्र प्रेस
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