गुजरात: आदिवासी क्षेत्रों में 89 नई एम्बुलेंस, इमरजेंसी रिस्पॉन्स टाइम 18 मिनट से घटाकर 10 मिनट करने का लक्ष्य
सारांश
मुख्य बातें
गुजरात सरकार ने राज्य के आदिवासी क्षेत्रों में आपातकालीन स्वास्थ्य सेवाओं को मज़बूत करने के लिए 89 नई एम्बुलेंस जोड़ने की पहल शुरू की है, जिसका मुख्य उद्देश्य इन दुर्गम इलाकों में इमरजेंसी रिस्पॉन्स टाइम को मौजूदा 18 मिनट 32 सेकंड से घटाकर लगभग 10 मिनट तक लाना है। मुख्यमंत्री भूपेंद्र पटेल के नेतृत्व में उठाया गया यह कदम आदिवासी और गैर-आदिवासी इलाकों के बीच स्वास्थ्य सेवा की खाई को पाटने की दिशा में एक महत्वपूर्ण प्रयास माना जा रहा है।
मौजूदा स्थिति और चुनौतियाँ
आँकड़ों के अनुसार, पूरे गुजरात में 108 इमरजेंसी एम्बुलेंस सेवा का औसत रिस्पॉन्स टाइम लगभग 13 मिनट 9 सेकंड है। शहरी क्षेत्रों में यह समय 9 मिनट 55 सेकंड है, जबकि ग्रामीण इलाकों में 16 मिनट 28 सेकंड तक पहुँच जाता है। आदिवासी क्षेत्रों में मुश्किल भौगोलिक परिस्थितियों के कारण यह आँकड़ा सबसे अधिक — 18 मिनट 32 सेकंड — है।
जंगली और पहाड़ी इलाके, दूरदराज की बस्तियाँ और मानसून के दौरान बाधित सड़क संपर्क एम्बुलेंस की पहुँच में सबसे बड़ी बाधाएँ हैं। यह ऐसे समय में आया है जब स्वास्थ्य विशेषज्ञ लंबे समय से चेताते रहे हैं कि 'गोल्डन आवर' में उपचार न मिलने से गंभीर मामलों में मृत्यु दर उल्लेखनीय रूप से बढ़ जाती है।
नई एम्बुलेंस बेड़े का विवरण
प्रस्तावित 89 नई एम्बुलेंस में तीन श्रेणियाँ शामिल हैं — 22 एडवांस्ड लाइफ सपोर्ट (ALS) एम्बुलेंस, 55 बेसिक लाइफ सपोर्ट (BLS) एम्बुलेंस और 12 फोर-व्हील-ड्राइव (4WD) एम्बुलेंस। इन्हें आदिवासी इलाकों की अलग-अलग इमरजेंसी ज़रूरतों के अनुसार तैयार किया गया है।
विशेष रूप से 12 चार पहिया ड्राइव (4WD) एम्बुलेंस का समावेश अत्यंत महत्वपूर्ण है, क्योंकि भारी बारिश, बाढ़ या कच्चे रास्तों पर सामान्य एम्बुलेंस का पहुँचना प्रायः असंभव हो जाता है। नई एम्बुलेंस जुड़ने के बाद चिन्हित आदिवासी ज़िलों में एम्बुलेंस की कुल संख्या मौजूदा 553 से बढ़कर 642 हो जाएगी।
किन्हें होगा सबसे अधिक लाभ
गौरतलब है कि दूरदराज और दुर्गम आदिवासी बस्तियों में रहने वाली गर्भवती महिलाओं, नवजात शिशुओं, बच्चों, बुजुर्गों, दिव्यांगों और गंभीर रूप से बीमार मरीजों के लिए समय पर आपातकालीन सेवा मिलना सर्वाधिक महत्वपूर्ण है। इस विस्तार से इन कमज़ोर वर्गों को 'गोल्डन आवर' के भीतर चिकित्सा सहायता मिलने की संभावना काफी बढ़ जाएगी।
इस पहल का मकसद इमरजेंसी ट्रांसपोर्ट के दोनों अहम चरणों — मरीज तक पहुँचने का समय और मरीज को अस्पताल पहुँचाने का समय — को बेहतर बनाना है। इससे दूरदराज के आदिवासी समुदायों और स्वास्थ्य केंद्रों के बीच कनेक्टिविटी भी मज़बूत होगी।
क्रियान्वयन की स्थिति
अधिकारियों के अनुसार, इन एम्बुलेंस की खरीद प्रक्रिया अभी जारी है और इसकी देखरेख गांधीनगर में चिकित्सा सेवाओं के अतिरिक्त निदेशक कर रहे हैं। एम्बुलेंस की तैनाती के बाद आदिवासी और गैर-आदिवासी इलाकों के बीच रिस्पॉन्स टाइम का अंतर उल्लेखनीय रूप से कम होने की उम्मीद जताई जा रही है।
यह ध्यान देने योग्य है कि यह राज्य का 108 इमरजेंसी एम्बुलेंस नेटवर्क अब तक के सबसे बड़े आदिवासी-केंद्रित विस्तारों में से एक है। खरीद पूरी होने के बाद यह नेटवर्क विविध भौगोलिक और मौसमी चुनौतियों का अधिक प्रभावी ढंग से सामना कर सकेगा।