स्ट्रेट ऑफ होर्मुज संकट: 1,550 जहाज फंसे, अमेरिका का 'प्रोजेक्ट फ्रीडम' शुरू, भारत पर तेल महंगाई का खतरा
सारांश
मुख्य बातें
स्ट्रेट ऑफ होर्मुज में अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते तनाव के चलते 5 मई 2026 तक 1,550 से अधिक कमर्शियल जहाज इस संकरे समुद्री रास्ते पर रुक गए हैं, जिनमें सवार लगभग 22,500 नाविक आगे नहीं बढ़ पा रहे। इस गतिरोध से वैश्विक तेल आपूर्ति और सप्लाई चेन पर गंभीर दबाव बन रहा है, और भारत जैसे आयात-निर्भर देशों के लिए महंगाई का जोखिम भी बढ़ गया है।
मुख्य घटनाक्रम
अमेरिकी रक्षा मंत्री पीट हेगसेथ ने आरोप लगाया कि ईरान नागरिक जहाजों को परेशान कर रहा है, हर देश के नाविकों को धमका रहा है और एक अहम समुद्री रास्ते को हथियार की तरह इस्तेमाल कर रहा है। उन्होंने इसे अंतरराष्ट्रीय दबाव या वसूली जैसा तरीका बताया।
ज्वाइंट चीफ्स के चेयरमैन एयर फोर्स जनरल डैन केन ने बताया कि पिछले सात हफ्तों में ईरान ने बार-बार कमर्शियल शिपिंग को धमकाया और हमला किया है। उनके अनुसार, सीजफायर के बाद भी ईरान ने नौ बार कमर्शियल जहाजों पर हमला किया है, दो कंटेनर जहाजों को जब्त किया है और अमेरिकी बलों पर दस से अधिक हमले किए हैं।
अमेरिका की सैन्य प्रतिक्रिया
वाशिंगटन ने इस इलाके में 15,000 से अधिक सैनिक, युद्धपोत, हेलिकॉप्टर और 100 से अधिक विमान तैनात किए हैं। इसके साथ ही 'प्रोजेक्ट फ्रीडम' नामक अभियान शुरू किया गया है, जिसका उद्देश्य समुद्री व्यापार को पुनः सामान्य बनाना है।
इस अभियान के तहत दो अमेरिकी झंडे वाले कमर्शियल जहाज पहले ही अमेरिकी डेस्ट्रॉयर जहाजों की सुरक्षा में इस रास्ते से गुजर चुके हैं। हेगसेथ ने स्पष्ट किया कि सीजफायर अभी खत्म नहीं हुआ है और इस मिशन को उन्होंने रक्षात्मक कदम बताया, जिसका मकसद केवल समुद्री रास्ते को सुरक्षित रखना है।
स्ट्रेट ऑफ होर्मुज का भू-राजनीतिक महत्व
स्ट्रेट ऑफ होर्मुज, ईरान और ओमान के बीच स्थित एक अत्यंत संकरा किंतु रणनीतिक दृष्टि से महत्वपूर्ण समुद्री मार्ग है। दुनिया की लगभग 20 प्रतिशत तेल खपत इसी रास्ते से गुजरती है, जो इसे वैश्विक ऊर्जा व्यापार की जीवनरेखा बनाता है।
यह क्षेत्र लंबे समय से भू-राजनीतिक तनाव का केंद्र रहा है, लेकिन मौजूदा संकट हाल के हफ्तों में बढ़े तनाव और एक कमजोर सीजफायर के बाद सामने आया है जो कथित तौर पर अभी भी लागू है।
वैश्विक व्यापार और सप्लाई चेन पर असर
तेल टैंकरों और कार्गो जहाजों की भारी कतार लगने से तेल आपूर्ति में देरी और पूरी सप्लाई चेन बाधित होने की आशंका बढ़ गई है। शिपिंग और बीमा कंपनियाँ अब जोखिम को नए सिरे से आंक रही हैं, जिससे माल ढुलाई और बीमा की लागत में उल्लेखनीय वृद्धि हो सकती है।
गौरतलब है कि यह ऐसे समय में आया है जब वैश्विक अर्थव्यवस्था पहले से ही आपूर्ति श्रृंखला के दबावों से जूझ रही है, और किसी भी दीर्घकालिक व्यवधान का असर उपभोक्ता कीमतों पर सीधे पड़ सकता है।
भारत पर संभावित असर
भारत खाड़ी देशों से बड़े पैमाने पर कच्चा तेल आयात करता है और यदि यह रुकावट लंबे समय तक बनी रहती है, तो तेल की कीमतें बढ़ सकती हैं। इससे आयात खर्च में इजाफा होगा और महंगाई का दबाव भी महसूस किया जा सकता है।
आने वाले दिनों में इस संकट के समाधान की दिशा यह तय करेगी कि वैश्विक ऊर्जा बाजार और भारतीय अर्थव्यवस्था पर इसका कितना गहरा असर पड़ता है।