एआईएडीएमके को बड़ा झटका: तिरुवल्लूर के पूर्व सांसद डॉ. पी. वेणुगोपाल ने पार्टी से दिया इस्तीफा
सारांश
मुख्य बातें
ऑल इंडिया अन्ना द्रविड़ मुनेत्र कषगम (एआईएडीएमके) को 24 मई 2026 को उस वक्त गहरा राजनीतिक झटका लगा, जब तिरुवल्लूर से दो बार लोकसभा सांसद रह चुके डॉ. पी. वेणुगोपाल ने पार्टी से इस्तीफे की औपचारिक घोषणा कर दी। अनुसूचित जाति समुदाय के प्रमुख नेता माने जाने वाले वेणुगोपाल का यह कदम ऐसे समय में आया है जब पार्टी पहले से ही वरिष्ठ नेताओं के पलायन और अंदरूनी कलह से जूझ रही है।
कौन हैं डॉ. पी. वेणुगोपाल
डॉ. पी. वेणुगोपाल एआईएडीएमके के उन वरिष्ठ स्तंभों में से एक रहे हैं जो पार्टी की मेडिकल विंग की स्थापना से ही उसमें सक्रिय भूमिका निभाते आए थे। उन्होंने लोकसभा में एआईएडीएमके संसदीय दल के नेता के रूप में भी कार्य किया। तिरुवल्लूर से लगातार दो बार सांसद रहे वेणुगोपाल पार्टी के भीतर दलित और अनुसूचित जाति मतदाताओं तक पहुँच बनाने वाले अहम चेहरे थे।
इस्तीफे की वजह: नेतृत्व और उम्मीदवार चयन पर सवाल
अपने बयान में डॉ. वेणुगोपाल ने पार्टी की गिरती स्थिति के लिए कई राजनीतिक और सामाजिक कारण गिनाए। उन्होंने कहा कि पूर्व मुख्यमंत्री जे. जयललिता के निधन के बाद से अनुसूचित जाति समुदायों के बीच पार्टी का समर्थन आधार लगातार सिकुड़ता जा रहा है। उन्होंने एआईएडीएमके महासचिव एडप्पादी के. पलानीस्वामी के नेतृत्व शैली पर भी सीधे सवाल उठाए।
वेणुगोपाल ने उम्मीदवार चयन की प्रक्रिया की आलोचना करते हुए कहा कि जयललिता के कार्यकाल में वरिष्ठ नेताओं को राज्यसभा में उचित प्रतिनिधित्व दिया जाता था, जबकि मौजूदा रवैये ने पार्टी कार्यकर्ताओं के बीच असंतोष और चिंता पैदा की है। उनके अनुसार, संगठन और चुनावी रणनीति में बेहतर राजनीतिक सूझबूझ की सख्त जरूरत है।
वरिष्ठ नेताओं का पलायन: बढ़ती संकट की तस्वीर
गौरतलब है कि डॉ. वेणुगोपाल का इस्तीफा अकेला नहीं है। हाल के हफ्तों में पूर्व मंत्री एस. सेम्मलाई और पूर्व विधानसभा अध्यक्ष पी. धनपाल समेत कई वरिष्ठ नेता पार्टी छोड़ चुके हैं। यह ऐसे समय में हो रहा है जब एआईएडीएमके लगातार चुनावी पराजय के बाद अपना खोया हुआ जनाधार वापस पाने के लिए संघर्ष कर रही है।
पार्टी के सामने संगठनात्मक चुनौती
डॉ. वेणुगोपाल ने सुझाव दिया कि पार्टी की पुनर्स्थापना के लिए एक समावेशी राजनीतिक दृष्टिकोण अपनाना होगा जो संगठन के भीतर सभी वर्गों और समुदायों को साथ लेकर चले। विशेषज्ञों का मानना है कि एआईएडीएमके के लिए यह संकट केवल नेताओं के जाने तक सीमित नहीं है — यह उस विचारधारात्मक और सामाजिक आधार के कमज़ोर होने का संकेत है जिस पर पार्टी दशकों से टिकी रही।
आगे क्या होगा
वरिष्ठ नेताओं के लगातार पार्टी छोड़ने और गुटबाजी के सामने आने के साथ ही एआईएडीएमके पर अब यह दबाव और बढ़ गया है कि वह संगठनात्मक चुनौतियों से निपटे और आगामी राजनीतिक लड़ाइयों से पहले अपने आधार को फिर से मजबूत करे। पलानीस्वामी के नेतृत्व की परीक्षा यह होगी कि क्या वे इस विघटन को रोक पाते हैं और पार्टी को एकजुट कर पाते हैं।