उज्जैन: बाबा महाकाल का राजा स्वरूप शृंगार, रजत चंद्र-त्रिशूल और ड्रायफ्रूट से हुआ अभिषेक
सारांश
मुख्य बातें
उज्जैन स्थित श्री महाकालेश्वर मंदिर में मंगलवार, 3 नवंबर 2026 को बाबा महाकाल की भव्य भस्म आरती संपन्न हुई, जिसमें बड़ी संख्या में श्रद्धालु दर्शन लाभ के लिए उपस्थित रहे। मंदिर परिसर ढोल-नगाड़ों, शंखध्वनि और 'जय श्री महाकाल' के उद्घोष से गुंजायमान हो उठा।
कपाट खुलने से आरती तक का क्रम
तड़के भगवान वीरभद्र की आज्ञा लेने के पश्चात् ढोल-नगाड़ों की गूंज के बीच बाबा महाकाल के कपाट खोले गए। मंत्रोच्चार के बीच जलाभिषेक किया गया और उसके बाद दूध, दही, घी, शहद तथा फलों के रस से निर्मित पंचामृत से अभिषेक संपन्न हुआ।
प्रथम घंटाल बजाकर हरिओम जल अर्पित किया गया। कपूर की आरती के उपरांत बाबा महाकाल ने मुकुट धारण किया। तत्पश्चात् झांझ-मंजीरे, ढोल-नगाड़े और शंखनाद की मधुर ध्वनि में भस्म आरती की गई।
राजा स्वरूप शृंगार की विशेषता
इस अवसर पर बाबा महाकाल का रजत चंद्र, त्रिशूल, त्रिपुंड तथा ड्रायफ्रूट से विशेष राजा स्वरूप शृंगार किया गया। झांझ-मंजीरे और डमरू की ध्वनि के बीच आरती संपन्न हुई, और दिव्य शृंगार के बाद श्रद्धालुओं को बाबा के दर्शन का सौभाग्य प्राप्त हुआ।
श्रद्धालुओं की उमड़ी भीड़
अपने आराध्य देव के दर्शन के लिए श्रद्धालु रात से ही कतारबद्ध थे। महाकाल की नगरी उज्जैन में दूर-दूर से पहुँचे भक्तों ने भस्म आरती में सम्मिलित होकर खुद को धन्य महसूस किया। मंदिर परिसर घंटियों, शंखध्वनि और मंत्रोच्चार से एक अलौकिक वातावरण में डूबा रहा।
परंपरा और मान्यता
परंपरा के अनुसार, महानिर्वाणी अखाड़े की ओर से बाबा महाकाल को भस्म अर्पित की जाती है। मान्यता है कि भस्म अर्पण के पश्चात् बाबा महाकाल निराकार से साकार रूप में अपने भक्तों को दर्शन देते हैं। यही अनूठी धार्मिक परंपरा देश-विदेश के श्रद्धालुओं को उज्जैन की पावन भूमि की ओर बार-बार आकर्षित करती है।
श्री महाकालेश्वर मंदिर में प्रतिदिन संपन्न होने वाली यह भस्म आरती भारत की सांस्कृतिक और आध्यात्मिक धरोहर का अभिन्न हिस्सा है, और आस्था के इस अद्वितीय केंद्र में श्रद्धालुओं की उपस्थिति निरंतर बढ़ती जा रही है।