बंगाल हस्ताक्षर जालसाजी विवाद: CID ने 4 सदस्यीय SIT गठित की, DIG करेंगे नेतृत्व
सारांश
मुख्य बातें
पश्चिम बंगाल की आपराधिक जांच विभाग (CID) ने 1 जून 2026 को एक चार सदस्यीय विशेष जांच दल (SIT) का गठन किया है, जो तृणमूल कांग्रेस (TMC) विधायकों के हस्ताक्षरों में कथित जालसाजी की जांच करेगी। यह विवाद पश्चिम बंगाल विधानसभा में विपक्ष के नेता, उपनेता और मुख्य सचेतक की नियुक्ति से जुड़े एक पत्र के सिलसिले में उठा है। SIT का नेतृत्व DIG रैंक के एक अधिकारी के हाथ में होगा, जबकि एक DSP और दो इंस्पेक्टर इसके सदस्य होंगे।
विवाद की जड़ क्या है
TMC महासचिव अभिषेक बनर्जी की ओर से विधानसभा अध्यक्ष को एक पत्र भेजा गया था, जिसमें विपक्ष के नेता, उपनेता और मुख्य सचेतक की नियुक्ति का प्रस्ताव था। विधानसभा अध्यक्ष ने इस पत्र को स्वीकार करने से इनकार करते हुए सवाल उठाया कि किस अधिकार के तहत महासचिव द्वारा यह प्रस्ताव भेजा गया। उन्होंने यह भी पूछा कि जिन विधायकों ने इन नेताओं का चयन किया है, उनके हस्ताक्षर कहाँ हैं।
हस्ताक्षर असमानता और शिकायत
जाँच में कुछ TMC विधायकों के हस्ताक्षरों में असमानता पाई गई। इसके बाद विधानसभा की ओर से कोलकाता के हेयर स्ट्रीट थाने में औपचारिक शिकायत दर्ज कराई गई। पुलिस ने CID की सहायता से जाँच शुरू की और अब CID ने SIT का गठन कर इस मामले को संस्थागत जाँच के दायरे में ला दिया है।
विधानसभा परिसर में तनाव
इस विवाद के बाद कुछ TMC नेताओं ने विधानसभा परिसर में नारेबाजी की। वे विधानसभा अध्यक्ष से मुलाकात की माँग को लेकर कई बार उनके कक्ष के बाहर पहुँचे, लेकिन उन्हें मुलाकात नहीं मिली।
अभिषेक बनर्जी पर हमला और गिरफ्तारियाँ
इसी बीच, अभिषेक बनर्जी विधानसभा चुनाव के बाद हुई हिंसा में मारे गए एक TMC कार्यकर्ता के परिवार से मिलने सोनारपुर गए, जहाँ प्रदर्शनकारियों के एक समूह ने कथित तौर पर उन पर अंडे और ईंट के टुकड़े फेंके। पुलिस के अनुसार, इस हमले से संबंधित 6 लोगों को गिरफ्तार किया जा चुका है। सोनारपुर थाने की टीम ने रातभर इलाके में सर्च अभियान चलाया और हमले से जुड़े वीडियो फुटेज की भी जाँच की गई।
आगे क्या होगा
यह ऐसे समय में आया है जब TMC विधानसभा चुनाव में हार के बाद संगठनात्मक संकट से जूझ रही है। SIT की जाँच के नतीजे यह तय करेंगे कि हस्ताक्षर जालसाजी का मामला आगे किस दिशा में जाता है। गौरतलब है कि यह पूरा विवाद पार्टी के भीतर और विधानसभा में विपक्षी नेतृत्व की संरचना को लेकर चल रही खींचतान का हिस्सा प्रतीत होता है।