नेपाल बाढ़ के बाद भारत का स्पष्ट संदेश: विकसित देश उत्सर्जन घटाने में करें पहल, विकासशील देशों को दें वित्त-तकनीक सहायता
सारांश
मुख्य बातें
विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने 4 सितंबर 2026 को नई दिल्ली में मीडिया ब्रीफिंग के दौरान स्पष्ट किया कि ऐतिहासिक रूप से सर्वाधिक उत्सर्जन के लिए जिम्मेदार विकसित देशों को उत्सर्जन कटौती में अग्रणी भूमिका निभानी चाहिए और विकासशील देशों को वित्त एवं प्रौद्योगिकी हस्तांतरण के ज़रिए सहयोग देना चाहिए। यह बयान नेपाल के विदेश मंत्री शिशिर खनाल की उन टिप्पणियों के संदर्भ में आया, जिनमें उन्होंने विनाशकारी बाढ़ के बाद बड़े औद्योगिक उत्सर्जकों से 'न्याय और मुआवजे' की माँग की थी।
नेपाल में बाढ़ की विभीषिका
नेपाल में आई विनाशकारी बाढ़ ने भारी तबाही मचाई है। 4 सितंबर की शाम तक 1,294 लोगों की मौत की आधिकारिक पुष्टि हो चुकी थी, जबकि 5,053 लोग अभी भी लापता बताए जा रहे हैं। इस आपदा ने हिमालयी देश के बुनियादी ढाँचे और जनजीवन को गहरा आघात पहुँचाया है।
भारत की त्वरित प्रतिक्रिया और एकजुटता
जायसवाल ने बताया कि जैसे ही यह त्रासदी सामने आई, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने नेपाल के प्रधानमंत्री से सीधी बात की और भरोसा दिलाया कि भारत संकट की इस घड़ी में नेपाल के साथ कंधे से कंधा मिलाकर खड़ा है। उन्होंने कहा, "एक करीबी दोस्त और साझेदार के तौर पर भारत ने तुरंत प्रतिक्रिया दी, और हम देश में बचाव, राहत, पुनर्निर्माण और रिकवरी के प्रयासों में सहयोग जारी रखे हुए हैं।" नेपाल के प्रधानमंत्री बालेनद्र शाह ने भारत के इस समर्थन के लिए आभार व्यक्त किया।
जलवायु न्याय पर भारत का पक्ष
जायसवाल ने जलवायु परिवर्तन पर भारत की दीर्घकालिक नीतिगत स्थिति दोहराई। उन्होंने कहा, "जलवायु परिवर्तन एक साझा चुनौती है और इस संबंध में कार्रवाई 'साझा लेकिन अलग-अलग जिम्मेदारियों और संबंधित क्षमताओं' के सिद्धांत पर आधारित होनी चाहिए।" उन्होंने आगे स्पष्ट किया कि जिन विकसित देशों ने ऐतिहासिक रूप से सबसे अधिक उत्सर्जन किया है, उनका दायित्व बनता है कि वे कटौती में पहल करें और विकासशील देशों को वित्त तथा प्रौद्योगिकी हस्तांतरण के माध्यम से सक्षम बनाएँ।
नेपाल का राजनयिक रुख: 'सहायता' से 'न्याय' की ओर
काठमांडू की स्थानीय मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, नेपाल के विदेश मंत्री खनाल ने इस सप्ताह के शुरू में कहा था कि वे अपने राजनयिक ढाँचे को 'सहायता' से बदलकर 'न्याय और मुआवजे' की ओर ले जा रहे हैं और यह दान का मामला नहीं है। यह बयान उन देशों के लिए एक महत्त्वपूर्ण संकेत है जो जलवायु वार्ताओं में विकासशील देशों की माँगों को केवल मानवीय सहायता के दायरे में सीमित रखना चाहते हैं।
आगे की राह
यह ऐसे समय में आया है जब वैश्विक जलवायु वार्ताओं में 'लॉस एंड डैमेज' (नुकसान और क्षति) कोष को लेकर विकसित और विकासशील देशों के बीच मतभेद गहरे हो रहे हैं। भारत का यह स्पष्ट रुख आगामी अंतर्राष्ट्रीय जलवायु बैठकों में विकासशील देशों के गठजोड़ को मज़बूती दे सकता है।