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ईडी की जैसलमेर में छापेमारी: बेल्जियम की संस्था से ₹5.10 करोड़ के FCRA उल्लंघन का मामला

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ईडी की जैसलमेर में छापेमारी: बेल्जियम की संस्था से ₹5.10 करोड़ के FCRA उल्लंघन का मामला

सारांश

ईडी ने जैसलमेर में बेल्जियम की संस्था 'अमर एएसबीएल' से जुड़े ₹5.10 करोड़ के कथित विदेशी फंड दुरुपयोग पर शिकंजा कसा है। FCRA पंजीकरण के बिना 14-15 साल से चला आ रहा यह कथित नेटवर्क अब जांच के घेरे में है।

मुख्य बातें

प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) ने 19 सितंबर 2026 को जैसलमेर के दो ठिकानों पर FEMA के तहत तलाशी ली।
कार्रवाई बेल्जियम की संस्था 'अमर एएसबीएल' से प्राप्त कथित ₹5.10 करोड़ के विदेशी फंड के दुरुपयोग से जुड़ी है।
आरोपी देउ राम और सहयोगी ज्ञान चंद ने बिना FCRA पंजीकरण के यह धनराशि प्राप्त की।
संबंधित बैंक खातों से लगभग ₹2.60 करोड़ निकाले गए; वित्तीय रिकॉर्ड का अभाव पाया गया।
संस्था 2011 में ब्रुसेल्स में पंजीकृत हुई और कथित तौर पर 14-15 वर्षों से भारत में अनौपचारिक रूप से सक्रिय थी।
तलाशी में आपत्तिजनक दस्तावेज़ व डिजिटल रिकॉर्ड जब्त; मामले में आगे की जांच जारी है।

प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) ने 19 सितंबर 2026 को राजस्थान के जैसलमेर जिले में दो ठिकानों पर तलाशी अभियान चलाया। यह कार्रवाई बेल्जियम की संस्था से प्राप्त कथित ₹5.10 करोड़ के विदेशी फंड के दुरुपयोग के सिलसिले में की गई, जिसे 'फॉरेन कंट्रीब्यूशन (रेगुलेशन) एक्ट' (FCRA) के तहत अनिवार्य पंजीकरण के बिना हासिल किया गया था। जांच एजेंसी के अनुसार, इस फंड का इस्तेमाल कमज़ोर वर्गों को सामाजिक, सांस्कृतिक और धार्मिक रूप से प्रभावित करने के लिए किया गया।

मामले की पृष्ठभूमि

जांच एजेंसी को खुफिया सूचना मिली थी कि जैसलमेर निवासी देउ राम को बेल्जियम की संस्थाओं से लगातार विदेशी रेमिटेंस प्राप्त हो रहा था। ईडी के अनुसार, देउ राम और उनके सहयोगी ज्ञान चंद ने मिलकर यह धनराशि प्राप्त की और इसे शिक्षा एवं समाज कल्याण के कार्यों की आड़ में उपयोग किया गया। जांच में 'फॉरेन एक्सचेंज मैनेजमेंट एक्ट' (FEMA) 1999 के तहत कार्रवाई की गई।

ब्रुसेल्स की संस्था 'अमर एएसबीएल' की भूमिका

ईडी के अनुसार, प्राप्त विदेशी फंड का एक बड़ा हिस्सा ब्रुसेल्स स्थित गैर-लाभकारी संस्था 'अमर एएसबीएल' से आया था, जिसकी स्थापना 2011 में हुई थी। इस संस्था का संचालन बेल्जियम के नागरिक जोस गोफिनेट और उनके बेटे सालियन गोफिनेट द्वारा किया जाता है। गौरतलब है कि यह संस्था केवल जैसलमेर में ही सक्रिय थी, फिर भी इसने भारत में कोई ट्रस्ट या एनजीओ पंजीकृत नहीं कराया।

आरोप है कि 14-15 वर्षों से यह संस्था देउ राम और ज्ञान चंद के माध्यम से भारत में अपनी गतिविधियाँ संचालित कर रही थी। जोस और सालियन गोफिनेट हर वर्ष जैसलमेर आते थे, लाभार्थी बच्चों के परिवारों से मुलाकात करते थे, और बैठकें तथा धार्मिक सभाएँ आयोजित करते थे।

धन के दुरुपयोग के आरोप

ईडी का आरोप है कि ₹5.10 करोड़ का यह विदेशी फंड कई मकसद-कोड के तहत भेजा गया — जैसे परिवार का भरण-पोषण, शैक्षिक सेवाएँ, सांस्कृतिक एवं मनोरंजक सेवाएँ, कमीशन एजेंट सेवाएँ और कर्मचारियों का वेतन — जबकि बेल्जियम की संस्था को वास्तव में ऐसी कोई सेवा नहीं दी गई थी।

जांचकर्ताओं के अनुसार, संबंधित बैंक खातों से लगभग ₹2.60 करोड़ निकाले गए और विदेशी फंड प्राप्ति व उसके उपयोग का कोई वैध वित्तीय रिकॉर्ड नहीं रखा गया। आरोप है कि फंड का एक हिस्सा निजी खर्चों में भी लगाया गया, जबकि शेष राशि का उपयोग कमज़ोर समुदायों की सांस्कृतिक और धार्मिक मान्यताओं को प्रभावित करने के लिए किया गया।

तलाशी में मिले साक्ष्य

तलाशी अभियान के दौरान अधिकारियों को कई आपत्तिजनक दस्तावेज़ और डिजिटल रिकॉर्ड बरामद हुए। ईडी ने यह भी बताया कि जब बैंकों ने देउ राम और ज्ञान चंद के खातों में विदेशी रेमिटेंस स्वीकार करना बंद किया, तो जैसलमेर में अन्य सहयोगियों के व्यक्तिगत बैंक खातों के माध्यम से धन भेजने का प्रयास किया गया।

आगे की जांच

एजेंसी के अनुसार इस मामले में आगे की जांच जारी है। यह मामला ऐसे समय में सामने आया है जब केंद्र सरकार विदेशी फंडिंग पर निगरानी को लेकर पहले से सख्त रुख अपना रही है। FCRA उल्लंघन के इस प्रकार के मामलों में ईडी की सक्रियता भविष्य में इस श्रेणी की जांच की दिशा तय कर सकती है।

संपादकीय दृष्टिकोण

'शैक्षिक सहायता' और 'भरण-पोषण' जैसे कोड के तहत धन भेजने का कथित तरीका यह सवाल उठाता है कि बैंकिंग तंत्र इतने वर्षों तक इन लेन-देन की असली प्रकृति को क्यों नहीं पहचान पाया। ईडी की इस कार्रवाई की असली कसौटी यह होगी कि क्या आरोप-पत्र में ठोस साक्ष्य और वित्तीय ट्रेल प्रस्तुत किए जाते हैं, या यह मामला जांच के स्तर पर ही रुक जाता है।
RashtraPress
21 सितंबर 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

ईडी ने जैसलमेर में छापेमारी क्यों की?
ईडी ने बेल्जियम की संस्था 'अमर एएसबीएल' से FCRA पंजीकरण के बिना प्राप्त ₹5.10 करोड़ के कथित विदेशी फंड के दुरुपयोग की जांच के तहत 19 सितंबर 2026 को जैसलमेर में दो ठिकानों पर तलाशी ली। खुफिया जानकारी के आधार पर FEMA 1999 के तहत यह कार्रवाई की गई।
'अमर एएसबीएल' क्या है और इसका भारत से क्या संबंध है?
'अमर एएसबीएल' ब्रुसेल्स, बेल्जियम में 2011 में पंजीकृत एक गैर-लाभकारी संस्था है, जिसे जोस गोफिनेट और उनके बेटे सालियन गोफिनेट संचालित करते हैं। ईडी के अनुसार यह संस्था कथित तौर पर 14-15 वर्षों से जैसलमेर में देउ राम और ज्ञान चंद के माध्यम से काम कर रही थी, लेकिन भारत में इसका कोई ट्रस्ट या एनजीओ पंजीकृत नहीं था।
FCRA उल्लंघन क्या होता है और इस मामले में क्या आरोप हैं?
FCRA (फॉरेन कंट्रीब्यूशन रेगुलेशन एक्ट) के तहत भारत में विदेशी चंदा प्राप्त करने के लिए पंजीकरण अनिवार्य है। इस मामले में आरोप है कि देउ राम और ज्ञान चंद ने बिना FCRA पंजीकरण के ₹5.10 करोड़ का विदेशी फंड प्राप्त किया और रेमिटेंस के उद्देश्य को गलत तरीके से दर्शाया।
तलाशी में क्या बरामद हुआ और इस मामले में अब तक क्या कार्रवाई हुई है?
तलाशी के दौरान आपत्तिजनक दस्तावेज़ और डिजिटल रिकॉर्ड जब्त किए गए। बैंक खातों से करीब ₹2.60 करोड़ निकाले जाने के साक्ष्य मिले और वित्तीय रिकॉर्ड का अभाव पाया गया। ईडी के अनुसार मामले में आगे की जांच जारी है।
कथित तौर पर फंड का उपयोग किस प्रकार किया गया?
ईडी का आरोप है कि फंड को शैक्षिक सेवाओं, परिवार भरण-पोषण और सांस्कृतिक गतिविधियों के नाम पर भेजा गया, जबकि वास्तव में ऐसी कोई सेवा नहीं दी गई। जांचकर्ताओं के अनुसार फंड का एक हिस्सा निजी खर्चों में लगाया गया और शेष का उपयोग कमज़ोर समुदायों की सांस्कृतिक व धार्मिक मान्यताओं को प्रभावित करने के लिए किया गया।
राष्ट्र प्रेस
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