11 अगस्त 2026
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आईआरसीटीसी के पूर्व अधिकारी कृष्ण मोहन त्रिपाठी को सीबीआई कोर्ट ने सुनाई 3 साल की जेल, ₹14.75 लाख जुर्माना

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आईआरसीटीसी के पूर्व अधिकारी कृष्ण मोहन त्रिपाठी को सीबीआई कोर्ट ने सुनाई 3 साल की जेल, ₹14.75 लाख जुर्माना

सारांश

लखनऊ सीबीआई अदालत ने आईआरसीटीसी के पूर्व चीफ रीजनल मैनेजर को ज्ञात आय से 102.53% अधिक, यानी ₹1.44 करोड़ की संपत्ति रखने का दोषी पाया। 2009 के ट्रैप ऑपरेशन से शुरू हुआ यह मामला 17 साल बाद अंजाम तक पहुँचा — और सीबीआई की सरकारी भ्रष्टाचार के विरुद्ध जारी मुहिम का ताज़ा उदाहरण बना।

मुख्य बातें

लखनऊ सीबीआई अदालत ने 11 अगस्त 2026 को कृष्ण मोहन त्रिपाठी , आईआरसीटीसी के पूर्व चीफ रीजनल मैनेजर, को दोषी ठहराया।
सजा: 3 साल की जेल और ₹14.75 लाख का जुर्माना।
त्रिपाठी के पास ज्ञात आय से 102.53% अधिक , यानी ₹1.44 करोड़ की संपत्ति साबित हुई।
मामले की शुरुआत 31 अक्टूबर 2009 के ट्रैप ऑपरेशन से हुई, जिसमें ₹70,000 की रिश्वत लेते पकड़ा गया था।
सीबीआई ने 24 फरवरी 2010 को डीए मामला दर्ज कर 13 दिसंबर 2011 को चार्जशीट दाखिल की थी।
सीबीआई ने फरवरी 2026 में पांडिचेरी विश्वविद्यालय के डिप्टी रजिस्ट्रार के खिलाफ भी डीए मामला दर्ज किया है।

लखनऊ की केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (सीबीआई) अदालत ने 11 अगस्त 2026 को आईआरसीटीसी के लखनऊ रीजनल ऑफिस के तत्कालीन चीफ रीजनल मैनेजर कृष्ण मोहन त्रिपाठी को आय से अधिक संपत्ति (डीए) के मामले में दोषी ठहराते हुए तीन साल की जेल और ₹14.75 लाख के जुर्माने की सजा सुनाई। अभियोजन पक्ष ने ट्रायल के दौरान साबित किया कि त्रिपाठी के पास उनकी ज्ञात आय के स्रोतों से 102.53 प्रतिशत अधिक, यानी ₹1.44 करोड़ की अवैध संपत्ति थी।

मामले की शुरुआत: ट्रैप ऑपरेशन से जांच तक

यह मामला 31 अक्टूबर 2009 को हुए एक ट्रैप ऑपरेशन से उपजा, जब त्रिपाठी को कथित तौर पर ₹70,000 की अवैध रिश्वत मांगते और स्वीकार करते हुए रंगे हाथों गिरफ्तार किया गया था। इस घटना के बाद सीबीआई ने गहन जांच शुरू की, जिसमें उनकी संपत्तियों के दस्तावेज खंगाले गए।

जांच में पाया गया कि त्रिपाठी ने अपनी वैध आय के स्रोतों से कहीं अधिक संपत्ति अर्जित की थी। इसके आधार पर सीबीआई ने 24 फरवरी 2010 को आय से अधिक संपत्ति का औपचारिक मामला दर्ज किया और 13 दिसंबर 2011 को अदालत में चार्जशीट दाखिल की।

अदालत में क्या साबित हुआ

ट्रायल के दौरान अभियोजन पक्ष ने दस्तावेजी साक्ष्यों के आधार पर यह स्थापित किया कि त्रिपाठी की संपत्ति उनकी कुल ज्ञात आय से 102.53 प्रतिशत अधिक थी — जो कि ₹1.44 करोड़ की राशि बनती है। प्रस्तुत साक्ष्यों की विस्तृत समीक्षा के बाद अदालत ने उन्हें दोषी करार देते हुए सजा सुनाई।

सीबीआई की व्यापक कार्रवाई का हिस्सा

यह फैसला ऐसे समय में आया है जब सीबीआई सरकारी कर्मचारियों के खिलाफ आय से अधिक संपत्ति के मामलों में लगातार कार्रवाई तेज कर रही है। गौरतलब है कि पिछले वर्ष जनवरी में अहमदाबाद की एक सीबीआई अदालत ने एम्प्लॉइज स्टेट इंश्योरेंस कॉर्पोरेशन (ESIC) के पूर्व इंस्पेक्टर अनिल कुमार सिंह को डीए मामले में तीन साल की कठोर कैद और ₹20 लाख के जुर्माने की सजा सुनाई थी। उन पर उनकी ज्ञात आय से 314 प्रतिशत अधिक संपत्ति रखने का आरोप साबित हुआ था।

इसके अलावा, फरवरी 2026 में सीबीआई ने पांडिचेरी विश्वविद्यालय के डिप्टी रजिस्ट्रार के खिलाफ भी मामला दर्ज किया। उन पर आरोप है कि उन्होंने लगभग ढाई वर्षों की अवधि में करीब ₹54 लाख की ऐसी संपत्ति अर्जित की, जो उनकी वैध आय से अधिक थी।

आम जनता पर असर और संदेश

यह निर्णय सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों में कार्यरत अधिकारियों को स्पष्ट संदेश देता है कि भ्रष्टाचार के मामलों में न केवल रिश्वत बल्कि अवैध रूप से अर्जित संपत्ति भी कानूनी कार्रवाई का आधार बनती है। यह ऐसे समय में और भी महत्वपूर्ण है जब सरकारी तंत्र में पारदर्शिता की माँग तेज हो रही है।

आगे क्या होगा

त्रिपाठी के पास अब उच्च न्यायालय में अपील का विकल्प उपलब्ध है। सीबीआई के अनुसार, एजेंसी वर्तमान में कई और सरकारी अधिकारियों के विरुद्ध डीए मामलों की जांच जारी रखे हुए है, और आने वाले महीनों में और चार्जशीट दाखिल होने की संभावना है।

संपादकीय दृष्टिकोण

यानी 17 साल की लंबी कानूनी लड़ाई। सीबीआई की कार्रवाइयाँ निरंतर हैं, लेकिन इतने लंबे ट्रायल में निवारक प्रभाव कमज़ोर पड़ जाता है। अहमदाबाद और पांडिचेरी के हालिया मामले संकेत देते हैं कि एजेंसी केंद्रीय उपक्रमों और विश्वविद्यालयों तक अपना दायरा बढ़ा रही है — यह स्वागत योग्य है, पर असली सवाल यह है कि त्वरित ट्रायल और संपत्ति की त्वरित जब्ती के बिना क्या यह कार्रवाई वास्तविक भय पैदा कर पाती है।
RashtraPress
11 अगस्त 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

कृष्ण मोहन त्रिपाठी कौन हैं और उन्हें किस मामले में सजा मिली?
कृष्ण मोहन त्रिपाठी आईआरसीटीसी के लखनऊ रीजनल ऑफिस के तत्कालीन चीफ रीजनल मैनेजर थे। लखनऊ की सीबीआई अदालत ने 11 अगस्त 2026 को उन्हें आय से अधिक संपत्ति (डीए) के मामले में दोषी ठहराते हुए 3 साल की जेल और ₹14.75 लाख जुर्माने की सजा सुनाई।
त्रिपाठी के खिलाफ मामला कैसे शुरू हुआ?
31 अक्टूबर 2009 को एक ट्रैप ऑपरेशन में त्रिपाठी को कथित तौर पर ₹70,000 की रिश्वत लेते रंगे हाथों पकड़ा गया था। इसके बाद हुई जांच में ₹1.44 करोड़ की आय से अधिक संपत्ति का पता चला, जिस पर सीबीआई ने 24 फरवरी 2010 को औपचारिक मामला दर्ज किया।
त्रिपाठी पर कितनी अधिक संपत्ति साबित हुई?
अभियोजन पक्ष ने अदालत में साबित किया कि त्रिपाठी के पास उनकी कुल ज्ञात आय से 102.53 प्रतिशत अधिक, यानी ₹1.44 करोड़ की संपत्ति थी। यही आधार उनकी दोषसिद्धि का मुख्य कारण बना।
क्या सीबीआई इस तरह के और मामलों पर कार्रवाई कर रही है?
हाँ, सीबीआई लगातार डीए मामलों में कार्रवाई कर रही है। पिछले साल अहमदाबाद में ESIC के पूर्व इंस्पेक्टर अनिल कुमार सिंह को 3 साल की कठोर कैद और ₹20 लाख जुर्माना हुआ था। फरवरी 2026 में पांडिचेरी विश्वविद्यालय के डिप्टी रजिस्ट्रार के खिलाफ भी ₹54 लाख की अतिरिक्त संपत्ति का मामला दर्ज किया गया है।
इस फैसले के बाद त्रिपाठी के पास क्या विकल्प है?
सीबीआई अदालत के फैसले के बाद त्रिपाठी के पास उच्च न्यायालय में अपील करने का कानूनी विकल्प उपलब्ध है। तब तक अदालत द्वारा सुनाई गई सजा प्रभावी रहेगी।
राष्ट्र प्रेस
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