आईआरसीटीसी के पूर्व अधिकारी कृष्ण मोहन त्रिपाठी को सीबीआई कोर्ट ने सुनाई 3 साल की जेल, ₹14.75 लाख जुर्माना
सारांश
मुख्य बातें
लखनऊ की केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (सीबीआई) अदालत ने 11 अगस्त 2026 को आईआरसीटीसी के लखनऊ रीजनल ऑफिस के तत्कालीन चीफ रीजनल मैनेजर कृष्ण मोहन त्रिपाठी को आय से अधिक संपत्ति (डीए) के मामले में दोषी ठहराते हुए तीन साल की जेल और ₹14.75 लाख के जुर्माने की सजा सुनाई। अभियोजन पक्ष ने ट्रायल के दौरान साबित किया कि त्रिपाठी के पास उनकी ज्ञात आय के स्रोतों से 102.53 प्रतिशत अधिक, यानी ₹1.44 करोड़ की अवैध संपत्ति थी।
मामले की शुरुआत: ट्रैप ऑपरेशन से जांच तक
यह मामला 31 अक्टूबर 2009 को हुए एक ट्रैप ऑपरेशन से उपजा, जब त्रिपाठी को कथित तौर पर ₹70,000 की अवैध रिश्वत मांगते और स्वीकार करते हुए रंगे हाथों गिरफ्तार किया गया था। इस घटना के बाद सीबीआई ने गहन जांच शुरू की, जिसमें उनकी संपत्तियों के दस्तावेज खंगाले गए।
जांच में पाया गया कि त्रिपाठी ने अपनी वैध आय के स्रोतों से कहीं अधिक संपत्ति अर्जित की थी। इसके आधार पर सीबीआई ने 24 फरवरी 2010 को आय से अधिक संपत्ति का औपचारिक मामला दर्ज किया और 13 दिसंबर 2011 को अदालत में चार्जशीट दाखिल की।
अदालत में क्या साबित हुआ
ट्रायल के दौरान अभियोजन पक्ष ने दस्तावेजी साक्ष्यों के आधार पर यह स्थापित किया कि त्रिपाठी की संपत्ति उनकी कुल ज्ञात आय से 102.53 प्रतिशत अधिक थी — जो कि ₹1.44 करोड़ की राशि बनती है। प्रस्तुत साक्ष्यों की विस्तृत समीक्षा के बाद अदालत ने उन्हें दोषी करार देते हुए सजा सुनाई।
सीबीआई की व्यापक कार्रवाई का हिस्सा
यह फैसला ऐसे समय में आया है जब सीबीआई सरकारी कर्मचारियों के खिलाफ आय से अधिक संपत्ति के मामलों में लगातार कार्रवाई तेज कर रही है। गौरतलब है कि पिछले वर्ष जनवरी में अहमदाबाद की एक सीबीआई अदालत ने एम्प्लॉइज स्टेट इंश्योरेंस कॉर्पोरेशन (ESIC) के पूर्व इंस्पेक्टर अनिल कुमार सिंह को डीए मामले में तीन साल की कठोर कैद और ₹20 लाख के जुर्माने की सजा सुनाई थी। उन पर उनकी ज्ञात आय से 314 प्रतिशत अधिक संपत्ति रखने का आरोप साबित हुआ था।
इसके अलावा, फरवरी 2026 में सीबीआई ने पांडिचेरी विश्वविद्यालय के डिप्टी रजिस्ट्रार के खिलाफ भी मामला दर्ज किया। उन पर आरोप है कि उन्होंने लगभग ढाई वर्षों की अवधि में करीब ₹54 लाख की ऐसी संपत्ति अर्जित की, जो उनकी वैध आय से अधिक थी।
आम जनता पर असर और संदेश
यह निर्णय सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों में कार्यरत अधिकारियों को स्पष्ट संदेश देता है कि भ्रष्टाचार के मामलों में न केवल रिश्वत बल्कि अवैध रूप से अर्जित संपत्ति भी कानूनी कार्रवाई का आधार बनती है। यह ऐसे समय में और भी महत्वपूर्ण है जब सरकारी तंत्र में पारदर्शिता की माँग तेज हो रही है।
आगे क्या होगा
त्रिपाठी के पास अब उच्च न्यायालय में अपील का विकल्प उपलब्ध है। सीबीआई के अनुसार, एजेंसी वर्तमान में कई और सरकारी अधिकारियों के विरुद्ध डीए मामलों की जांच जारी रखे हुए है, और आने वाले महीनों में और चार्जशीट दाखिल होने की संभावना है।