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'फ्री उमर खालिद' नारे गैरकानूनी नहीं, आरोप सिद्ध नहीं: सैयद कासिम रसूल इलियास

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'फ्री उमर खालिद' नारे गैरकानूनी नहीं, आरोप सिद्ध नहीं: सैयद कासिम रसूल इलियास

सारांश

उमर खालिद के पिता सैयद कासिम रसूल इलियास ने जामिया परिसर में लगे 'फ्री उमर खालिद' नारों का बचाव किया — कहा, अदालत में आरोप सिद्ध न होने तक समर्थन में आवाज़ उठाना अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता है। साथ ही छात्र संघ में छात्राओं की समान भागीदारी और हिजाब के अधिकार पर भी मुखर हुए।

मुख्य बातें

सैयद कासिम रसूल इलियास ने कहा कि 'फ्री उमर खालिद' और 'फ्री शरजील इमाम' नारे लगाना कानूनी रूप से गलत नहीं है।
उनका तर्क — न उमर खालिद पर, न शरजील इमाम पर अब तक अदालत में कोई आरोप सिद्ध हुआ है।
उन्होंने जामिया मिल्लिया इस्लामिया छात्र संघ में छात्राओं को पुरुष छात्रों के बराबर अधिकार दिए जाने का समर्थन किया।
संसद में 33 फीसदी महिला आरक्षण के अब तक पूरी तरह लागू न होने पर खेद जताया।
बुर्के और हिजाब पर प्रतिबंध की माँग को गलत बताया; सुरक्षा जाँच के लिए महिला कर्मियों द्वारा अलग व्यवस्था का सुझाव दिया।

नई दिल्ली में जामिया मिल्लिया इस्लामिया परिसर में लगाए गए 'फ्री उमर खालिद' और 'फ्री शरजील इमाम' नारों के विवाद पर उमर खालिद के पिता सैयद कासिम रसूल इलियास ने 26 अक्टूबर 2026 को स्पष्ट किया कि इन नारों में कोई कानूनी या संवैधानिक खामी नहीं है। उनका तर्क है कि चूँकि अदालत में न उमर खालिद पर और न ही शरजील इमाम पर अभी तक कोई आरोप सिद्ध हुआ है, इसलिए उनके समर्थन में आवाज़ उठाना अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के दायरे में आता है।

नारों पर इलियास का तर्क

सैयद कासिम रसूल इलियास ने कहा, 'यह किसी व्यक्ति की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का हिस्सा है कि वह बेल की माँग करे या किसी की रिहाई की माँग उठाए।' उन्होंने यह भी जोड़ा कि जब बड़े-बड़े मामलों में आरोप सिद्ध होने के बाद भी लोगों को ज़मानत मिल जाती है, तो ऐसे मामलों में — जहाँ अभी आरोप साबित नहीं हुए — समर्थन में नारे लगाना किसी भी दृष्टि से आपत्तिजनक नहीं है।

उन्होंने स्पष्ट किया कि यदि विश्वविद्यालय के छात्र अपने साथियों की रिहाई की माँग करते हैं, तो यह उनकी राय व्यक्त करने का एक स्वाभाविक तरीका है। उनके अनुसार संविधान प्रत्येक नागरिक को यह अधिकार देता है।

छात्र संघ में महिला भागीदारी पर रुख

इलियास ने छात्र संघ में छात्राओं की भागीदारी का समर्थन करते हुए कहा कि छात्र और छात्राएँ दोनों बराबर हैं और उन्हें समान अधिकार प्राप्त हैं। उन्होंने कहा, 'चाहे छात्र हों या छात्राएँ, दोनों को छात्रसंघ में भाग लेने, चुनाव लड़ने, प्रतिस्पर्धा करने, निर्वाचित होने और निर्वाचित होने के बाद छात्रों का प्रतिनिधित्व करने का समान अधिकार है।'

उन्होंने संसद में 33 फीसदी महिला आरक्षण के अब तक पूरी तरह लागू न होने पर खेद जताया और कहा कि यदि छात्र संघों में छात्राओं की भागीदारी बढ़ रही है तो यह समुदाय के लिए एक सकारात्मक संकेत है।

हिजाब और बुर्के पर विचार

बुर्के और हिजाब को लेकर छिड़ी बहस पर इलियास ने कहा कि यह भारत में कोई बड़ा मुद्दा नहीं है। उन्होंने कहा कि यदि कॉलेजों और विश्वविद्यालयों में छात्राएँ बुर्का या हिजाब पहनकर पढ़ती हैं और चुनाव भी लड़ती हैं, तो उसमें किसी को भी आपत्ति नहीं होनी चाहिए।

सुरक्षा संबंधी आशंकाओं का उत्तर देते हुए उन्होंने कहा कि एयरपोर्ट या अन्य संवेदनशील स्थानों पर महिला कर्मियों द्वारा अलग कक्ष में पहचान सत्यापन की व्यवस्था पहले से मौजूद है। इसलिए बुर्के पर प्रतिबंध की माँग उनके अनुसार उचित नहीं है।

उन्होंने फ्रांस जैसे देशों में उठे विवादों का उल्लेख करते हुए कहा कि इस्लाम के भीतर चेहरा ढकने को लेकर अलग-अलग मत हैं — कुछ इसे ज़रूरी मानते हैं, कुछ नहीं — और दोनों परंपराएँ मुस्लिम समाज में सह-अस्तित्व में हैं।

क्या होगा आगे

गौरतलब है कि उमर खालिद और शरजील इमाम दोनों दिल्ली दंगा षड्यंत्र मामले में बंद हैं और उनके मुकदमे अदालत में विचाराधीन हैं। इलियास के इस बयान के बाद यह बहस तेज़ हो सकती है कि क्या कैम्पस के भीतर इस तरह के नारे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की सीमा में आते हैं या नहीं। विधि विशेषज्ञों और छात्र संगठनों की प्रतिक्रिया अभी प्रतीक्षित है।

संपादकीय दृष्टिकोण

किसी के समर्थन में आवाज़ उठाना संविधान की अनुच्छेद 19 के तहत संरक्षित है। लेकिन बड़ा सवाल यह है कि विश्वविद्यालय परिसरों में इस तरह के नारे किस हद तक एक स्वस्थ लोकतांत्रिक अभिव्यक्ति हैं और किस हद तक वे संस्था की छवि को राजनीतिक अखाड़े में बदलते हैं। दिल्ली दंगा मामले में न्यायिक प्रक्रिया वर्षों से खिंच रही है, जो स्वयं में न्याय व्यवस्था की गति पर गंभीर सवाल खड़ा करती है। मुख्यधारा की कवरेज प्रायः इस पहलू को नज़रअंदाज़ करती है कि इतने लंबे समय तक बिना दोषसिद्धि के जेल में रहना भी नागरिक अधिकारों की एक केंद्रीय बहस है।
RashtraPress
26 अक्टूबर 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

सैयद कासिम रसूल इलियास ने 'फ्री उमर खालिद' नारों के बारे में क्या कहा?
उन्होंने कहा कि इन नारों में कानूनी या संवैधानिक रूप से कुछ भी गलत नहीं है, क्योंकि उमर खालिद और शरजील इमाम पर अदालत में अभी तक कोई आरोप सिद्ध नहीं हुआ है। यह अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के दायरे में आता है।
उमर खालिद और शरजील इमाम का मामला अभी किस स्थिति में है?
दोनों दिल्ली दंगा षड्यंत्र मामले में न्यायिक हिरासत में हैं और उनके मुकदमे अदालत में विचाराधीन हैं। इलियास के अनुसार अभी तक उन पर कोई आरोप न्यायालय में सिद्ध नहीं हुआ है।
इलियास ने जामिया मिल्लिया इस्लामिया के छात्र संघ में महिलाओं की भागीदारी पर क्या कहा?
उन्होंने छात्र और छात्राओं को समान अधिकार देने की पैरवी की। उनका कहना था कि चुनाव लड़ने, निर्वाचित होने और प्रतिनिधित्व करने का हक दोनों को बराबर है।
हिजाब और बुर्के पर इलियास का क्या रुख है?
उन्होंने बुर्के पर प्रतिबंध की माँग को गलत बताया और कहा कि यदि कोई महिला अपने धार्मिक और सांस्कृतिक मानकों के अनुसार वस्त्र पहनना चाहती है तो यह उसका अधिकार है। सुरक्षा जाँच के लिए महिला कर्मियों द्वारा अलग कक्ष में पहचान सत्यापन की मौजूदा व्यवस्था को उन्होंने पर्याप्त बताया।
संसद में महिला आरक्षण को लेकर इलियास ने क्या कहा?
उन्होंने खेद जताया कि संसद में 33 फीसदी महिला आरक्षण की बात कही गई थी, लेकिन वह अब तक पूरी तरह लागू नहीं हुआ है। उन्होंने इसे महिला सशक्तिकरण की दिशा में एक अधूरा कदम बताया।
राष्ट्र प्रेस
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