गोवा डिजिटल अरेस्ट घोटाला: ₹2.60 करोड़ की साइबर ठगी में ईडी ने सीए समेत 3 और गिरफ्तार, कुल 5 आरोपी हिरासत में
सारांश
मुख्य बातें
प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) ने 27 अगस्त 2026 को गोवा के चर्चित 'डिजिटल अरेस्ट' साइबर धोखाधड़ी मामले में तीन और आरोपियों को गिरफ्तार किया, जिनमें चार्टर्ड अकाउंटेंट भूषण सूर्यकांत मोये, विलास नारायण पवार और शैलेश दगडू चव्हाण शामिल हैं। इस मामले में अब तक गिरफ्तार आरोपियों की कुल संख्या पाँच हो गई है और गोवा की स्पेशल कोर्ट (पीएमएलए) ने तीनों को 1 सितंबर तक ईडी की हिरासत में भेज दिया है।
मामले की पृष्ठभूमि
यह जांच नॉर्थ गोवा के साइबर क्राइम पुलिस स्टेशन में 9 जून 2025 को दर्ज एफआईआर के आधार पर शुरू हुई थी। पीड़ित — गोवा का एक निवासी — को वीडियो कॉल पर रखकर यह विश्वास दिलाया गया कि वह किसी आपराधिक जांच के दायरे में है। इसके बाद उसे 'सीक्रेट सुपरविजन अकाउंट्स' का हवाला देकर ₹2.60 करोड़ ट्रांसफर करने के लिए मजबूर किया गया।
इससे पहले 23 अगस्त को ईडी ने फहीम मोइन हुसैन सैयद और नईम मुईन सैयद को गिरफ्तार किया था। 21 अगस्त को तीनों नए आरोपियों के ठिकानों पर तलाशी ली गई थी।
संगठित मनी लॉन्ड्रिंग नेटवर्क का खुलासा
ईडी की जांच के अनुसार, ठगी से हासिल रकम एक सुनियोजित तंत्र के ज़रिए सफेद की जाती थी। इस प्रक्रिया में साइबर फ्रॉड की राशि पहले बैंकिंग क्रेडिट के रूप में ली जाती थी, फिर नकद में बदली जाती थी और अंत में भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) से 'फुल फ्लेज्ड मनी चेंजर' लाइसेंस प्राप्त कंपनियों के माध्यम से विदेशी मुद्रा में परिवर्तित की जाती थी।
ईडी के बयान के अनुसार, रकम को 400 से अधिक बेनिफिशियरी अकाउंट्स में बाँटा गया और उन कंपनियों में भेजा गया, जिनके डायरेक्टर कागजों पर सीमित साधनों वाले लोग थे, जबकि खाते वास्तव में अन्य व्यक्तियों द्वारा संचालित किए जा रहे थे।
तीनों आरोपियों की भूमिका
ईडी के बयान के अनुसार, सीए भूषण सूर्यकांत मोये ने दिए गए पहचान दस्तावेजों के आधार पर नेटवर्क की 21 कंपनियाँ बनाईं और उनके 43 डमी डायरेक्टरों का एक समूह की तरह प्रबंधन करते हुए एक साथ इनकम-टैक्स रिटर्न दाखिल किए।
विलास नारायण पवार ने आरटीजीएस एंट्रीज़ का इंतजाम किया, जिनके ज़रिए अपराध से हासिल धन नेटवर्क के खातों तक पहुँचाया गया। वहीं शैलेश दगडू चव्हाण ने उन ट्रांसफर के बदले नकद उपलब्ध कराया।
व्यापक प्रभाव और नुकसान का आँकड़ा
ईडी की जांच में सामने आया कि इन संस्थाओं के खातों से 20 से अधिक राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों में 330 पीड़ितों की शिकायतें और 163 एफआईआर जुड़ी हैं। इन मामलों में कुल ₹417.49 करोड़ के नुकसान की बात सामने आई है और इन खातों से ₹27,850 करोड़ से अधिक का बैंकिंग ट्रांजैक्शन हुआ है।
गौरतलब है कि 17 जुलाई को हुई तलाशी के बाद भी मनी लॉन्ड्रिंग की गतिविधियाँ 23 अगस्त को हुई गिरफ्तारी से कुछ दिन पहले तक जारी रहीं, जिसे ईडी ने तीनों की गिरफ्तारी और हिरासत में पूछताछ के लिए ज़रूरी बताया।
आगे क्या होगा
पाँचों आरोपी अभी प्रिवेंशन ऑफ मनी लॉन्ड्रिंग एक्ट, 2002 की धारा 19 के तहत हिरासत में हैं। ईडी की जांच अभी जारी है और नेटवर्क से जुड़े अन्य सूत्रों की पड़ताल की जा रही है। यह मामला देशभर में बढ़ते 'डिजिटल अरेस्ट' घोटालों की एक बड़ी कड़ी के रूप में देखा जा रहा है।