29 अगस्त 2026
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गोवा डिजिटल अरेस्ट घोटाला: ₹2.60 करोड़ की साइबर ठगी में ईडी ने सीए समेत 3 और गिरफ्तार, कुल 5 आरोपी हिरासत में

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गोवा डिजिटल अरेस्ट घोटाला: ₹2.60 करोड़ की साइबर ठगी में ईडी ने सीए समेत 3 और गिरफ्तार, कुल 5 आरोपी हिरासत में

सारांश

गोवा के ₹2.60 करोड़ के 'डिजिटल अरेस्ट' घोटाले में ईडी ने सीए समेत 3 और आरोपियों को दबोचा। नेटवर्क 21 फर्जी कंपनियों, 400 से अधिक खातों और ₹27,850 करोड़ के संदिग्ध ट्रांजैक्शन से जुड़ा है — और 20 से अधिक राज्यों में 330 पीड़ित।

मुख्य बातें

ईडी ने 27 अगस्त 2026 को सीए भूषण सूर्यकांत मोये , विलास नारायण पवार और शैलेश दगडू चव्हाण को गिरफ्तार किया।
गोवा डिजिटल अरेस्ट मामले में अब कुल 5 आरोपी हिरासत में; तीनों को 1 सितंबर तक ईडी कस्टडी।
पीड़ित से ₹2.60 करोड़ ठगे गए; नेटवर्क से जुड़े खातों में ₹27,850 करोड़ से अधिक के ट्रांजैक्शन।
नेटवर्क में 21 फर्जी कंपनियाँ , 43 डमी डायरेक्टर और 400 से अधिक बेनिफिशियरी अकाउंट्स शामिल।
20 से अधिक राज्यों में 330 पीड़ित , 163 एफआईआर और ₹417.49 करोड़ के नुकसान की पुष्टि।
जांच का आधार नॉर्थ गोवा साइबर क्राइम पुलिस स्टेशन में 9 जून 2025 को दर्ज एफआईआर।

प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) ने 27 अगस्त 2026 को गोवा के चर्चित 'डिजिटल अरेस्ट' साइबर धोखाधड़ी मामले में तीन और आरोपियों को गिरफ्तार किया, जिनमें चार्टर्ड अकाउंटेंट भूषण सूर्यकांत मोये, विलास नारायण पवार और शैलेश दगडू चव्हाण शामिल हैं। इस मामले में अब तक गिरफ्तार आरोपियों की कुल संख्या पाँच हो गई है और गोवा की स्पेशल कोर्ट (पीएमएलए) ने तीनों को 1 सितंबर तक ईडी की हिरासत में भेज दिया है।

मामले की पृष्ठभूमि

यह जांच नॉर्थ गोवा के साइबर क्राइम पुलिस स्टेशन में 9 जून 2025 को दर्ज एफआईआर के आधार पर शुरू हुई थी। पीड़ित — गोवा का एक निवासी — को वीडियो कॉल पर रखकर यह विश्वास दिलाया गया कि वह किसी आपराधिक जांच के दायरे में है। इसके बाद उसे 'सीक्रेट सुपरविजन अकाउंट्स' का हवाला देकर ₹2.60 करोड़ ट्रांसफर करने के लिए मजबूर किया गया।

इससे पहले 23 अगस्त को ईडी ने फहीम मोइन हुसैन सैयद और नईम मुईन सैयद को गिरफ्तार किया था। 21 अगस्त को तीनों नए आरोपियों के ठिकानों पर तलाशी ली गई थी।

संगठित मनी लॉन्ड्रिंग नेटवर्क का खुलासा

ईडी की जांच के अनुसार, ठगी से हासिल रकम एक सुनियोजित तंत्र के ज़रिए सफेद की जाती थी। इस प्रक्रिया में साइबर फ्रॉड की राशि पहले बैंकिंग क्रेडिट के रूप में ली जाती थी, फिर नकद में बदली जाती थी और अंत में भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) से 'फुल फ्लेज्ड मनी चेंजर' लाइसेंस प्राप्त कंपनियों के माध्यम से विदेशी मुद्रा में परिवर्तित की जाती थी।

ईडी के बयान के अनुसार, रकम को 400 से अधिक बेनिफिशियरी अकाउंट्स में बाँटा गया और उन कंपनियों में भेजा गया, जिनके डायरेक्टर कागजों पर सीमित साधनों वाले लोग थे, जबकि खाते वास्तव में अन्य व्यक्तियों द्वारा संचालित किए जा रहे थे।

तीनों आरोपियों की भूमिका

ईडी के बयान के अनुसार, सीए भूषण सूर्यकांत मोये ने दिए गए पहचान दस्तावेजों के आधार पर नेटवर्क की 21 कंपनियाँ बनाईं और उनके 43 डमी डायरेक्टरों का एक समूह की तरह प्रबंधन करते हुए एक साथ इनकम-टैक्स रिटर्न दाखिल किए।

विलास नारायण पवार ने आरटीजीएस एंट्रीज़ का इंतजाम किया, जिनके ज़रिए अपराध से हासिल धन नेटवर्क के खातों तक पहुँचाया गया। वहीं शैलेश दगडू चव्हाण ने उन ट्रांसफर के बदले नकद उपलब्ध कराया।

व्यापक प्रभाव और नुकसान का आँकड़ा

ईडी की जांच में सामने आया कि इन संस्थाओं के खातों से 20 से अधिक राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों में 330 पीड़ितों की शिकायतें और 163 एफआईआर जुड़ी हैं। इन मामलों में कुल ₹417.49 करोड़ के नुकसान की बात सामने आई है और इन खातों से ₹27,850 करोड़ से अधिक का बैंकिंग ट्रांजैक्शन हुआ है।

गौरतलब है कि 17 जुलाई को हुई तलाशी के बाद भी मनी लॉन्ड्रिंग की गतिविधियाँ 23 अगस्त को हुई गिरफ्तारी से कुछ दिन पहले तक जारी रहीं, जिसे ईडी ने तीनों की गिरफ्तारी और हिरासत में पूछताछ के लिए ज़रूरी बताया।

आगे क्या होगा

पाँचों आरोपी अभी प्रिवेंशन ऑफ मनी लॉन्ड्रिंग एक्ट, 2002 की धारा 19 के तहत हिरासत में हैं। ईडी की जांच अभी जारी है और नेटवर्क से जुड़े अन्य सूत्रों की पड़ताल की जा रही है। यह मामला देशभर में बढ़ते 'डिजिटल अरेस्ट' घोटालों की एक बड़ी कड़ी के रूप में देखा जा रहा है।

संपादकीय दृष्टिकोण

850 करोड़ के संदिग्ध ट्रांजैक्शन और 20 से अधिक राज्यों में फैले नेटवर्क का खुलासा यह बताता है कि 'डिजिटल अरेस्ट' महज एक अपराध नहीं, बल्कि एक औद्योगिक पैमाने का वित्तीय तंत्र बन चुका है। एक सीए का इसमें शामिल होना और 21 फर्जी कंपनियों का निर्माण यह दर्शाता है कि इस नेटवर्क को पेशेवर सफेदपोश सहयोग मिल रहा था — जो साधारण साइबर ठगी से कहीं अधिक गंभीर है। सवाल यह है कि 17 जुलाई की तलाशी के बाद भी अगस्त के अंत तक मनी लॉन्ड्रिंग जारी रही — तो क्या निगरानी तंत्र में चूक हुई? 330 पीड़ितों और 163 एफआईआर के बावजूद गिरफ्तारी में लगे महीनों पर जवाब माँगे जाने चाहिए।
RashtraPress
29 अगस्त 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

गोवा डिजिटल अरेस्ट मामला क्या है?
यह गोवा के एक निवासी के साथ हुई ₹2.60 करोड़ की साइबर ठगी का मामला है, जिसमें पीड़ित को वीडियो कॉल पर रखकर 'सीक्रेट सुपरविजन अकाउंट्स' का हवाला देकर रकम ट्रांसफर करने के लिए मजबूर किया गया। ईडी ने इस मामले में अब तक 5 आरोपियों को गिरफ्तार किया है।
ईडी ने किन तीन लोगों को गिरफ्तार किया और उनकी क्या भूमिका थी?
ईडी ने 27 अगस्त को सीए भूषण सूर्यकांत मोये, विलास नारायण पवार और शैलेश दगडू चव्हाण को गिरफ्तार किया। मोये ने 21 फर्जी कंपनियाँ बनाईं, पवार ने आरटीजीएस एंट्रीज़ से अपराध की रकम नेटवर्क तक पहुँचाई और चव्हाण ने ट्रांसफर के बदले नकद उपलब्ध कराया।
इस नेटवर्क से कितने पीड़ित प्रभावित हुए हैं?
ईडी की जांच के अनुसार, इन संस्थाओं के खातों से 20 से अधिक राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों में 330 पीड़ितों की शिकायतें और 163 एफआईआर जुड़ी हैं। इन मामलों में कुल ₹417.49 करोड़ के नुकसान की बात सामने आई है।
मनी लॉन्ड्रिंग किस तरह की जाती थी?
ठगी की रकम को पहले बैंकिंग क्रेडिट के रूप में लिया जाता था, फिर नकद में बदला जाता था और RBI से 'फुल फ्लेज्ड मनी चेंजर' लाइसेंस प्राप्त कंपनियों के ज़रिए विदेशी मुद्रा में परिवर्तित किया जाता था। 400 से अधिक बेनिफिशियरी अकाउंट्स और 43 डमी डायरेक्टरों का उपयोग कर अपराध की रकम को 'व्हाइट मनी' दिखाया गया।
इस मामले में आगे क्या होगा?
तीनों नए आरोपी 1 सितंबर तक ईडी की हिरासत में हैं और पूछताछ जारी है। ईडी की जांच प्रिवेंशन ऑफ मनी लॉन्ड्रिंग एक्ट, 2002 के तहत चल रही है और नेटवर्क से जुड़े अन्य सूत्रों की पड़ताल अभी जारी है।
राष्ट्र प्रेस
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