माकपा का आखिरी गढ़ केरल भी हाथ से जाता दिखा, 50 वर्षों में पहली बार वाम दल बिना किसी राज्य की सत्ता के

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माकपा का आखिरी गढ़ केरल भी हाथ से जाता दिखा, 50 वर्षों में पहली बार वाम दल बिना किसी राज्य की सत्ता के

सारांश

भारतीय वामपंथ के लिए यह सिर्फ एक और चुनावी हार नहीं — यह एक युग का अंत है। केरल के रुझान अगर पक्के हुए तो 1970 के बाद पहली बार CPI-M और उसके सहयोगी दलों के पास एक भी राज्य की सत्ता नहीं होगी। जो आंदोलन कभी तीन राज्यों पर काबिज था और केंद्र की सत्ता तक पहुँचने वाला था, वह आज अस्तित्व की लड़ाई लड़ रहा है।

मुख्य बातें

केरल में ताज़ा रुझानों में कांग्रेस (INC) नेतृत्व वाला UDF अधिकांश सीटों पर आगे, LDF पिछड़ती दिख रही है।
अगर रुझान नतीजों में बदले तो 1970 के बाद पहली बार वाम दलों के पास देश का कोई राज्य नहीं होगा।
1977 से 2011 तक पश्चिम बंगाल में 34 वर्ष और त्रिपुरा में माणिक सरकार का करीब 20 वर्ष का शासन वामपंथ का स्वर्णकाल था।
2018 में त्रिपुरा में BJP ने 36 सीटें जीतकर वाम दलों को 50 से 16 सीटों पर समेट दिया था।
1996 में ज्योति बसु को PM पद का प्रस्ताव मिला था, जिसे पार्टी ने ठुकराया — बसु ने इसे बाद में 'ऐतिहासिक भूल' कहा।

भारतीय राजनीति में कभी निर्णायक भूमिका निभाने वाले वामपंथी दल अब एक ऐतिहासिक संकट के मुहाने पर खड़े हैं। केरल से आ रहे ताज़ा चुनावी रुझानों के अनुसार, मुख्यमंत्री पिनाराई विजयन के नेतृत्व वाला लेफ्ट डेमोक्रेटिक फ्रंट (LDF) सत्ता से बाहर होता दिख रहा है। अगर ये रुझान अंतिम नतीजों में बदलते हैं, तो 1970 के बाद पहली बार देश के किसी भी राज्य में वाम दलों की सरकार नहीं होगी — यह भारतीय वामपंथ के लिए एक ऐतिहासिक मोड़ होगा।

वामपंथ का स्वर्णकाल: जब तीन राज्यों पर था कब्जा

भारत में वाम राजनीति की जड़ें बेहद गहरी रही हैं। 1951-52 के पहले आम चुनाव में भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (CPI) संसद की सबसे बड़ी विपक्षी पार्टी बनकर उभरी थी। इसके बाद 1957 में केरल में दुनिया की पहली लोकतांत्रिक रूप से निर्वाचित कम्युनिस्ट सरकार बनी, जो अपने आप में एक ऐतिहासिक उपलब्धि थी।

1977 में पश्चिम बंगाल में भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) [CPI-M] के नेतृत्व में लेफ्ट फ्रंट ने सत्ता हासिल की और 34 वर्षों तक लगातार शासन किया। ज्योति बसु ने 23 वर्षों तक मुख्यमंत्री के रूप में कार्य किया और 2000 में बुद्धदेव भट्टाचार्य को सत्ता सौंपी। इसी दौर में त्रिपुरा में भी वाम दल मज़बूत थे, जहाँ माणिक सरकार करीब 20 वर्षों तक मुख्यमंत्री रहे।

1996 की 'ऐतिहासिक भूल' और राष्ट्रीय प्रभाव का शिखर

1996 में CPI-M के वरिष्ठ नेता ज्योति बसु देश के प्रधानमंत्री बनने के बेहद करीब पहुँच गए थे। यूनाइटेड फ्रंट सरकार के तहत उन्हें यह प्रस्ताव मिला था, लेकिन पार्टी के पोलित ब्यूरो ने इसे अस्वीकार कर दिया। बाद में स्वयं ज्योति बसु ने इस निर्णय को 'ऐतिहासिक भूल' बताया था।

2008 तक वामपंथी दल राष्ट्रीय राजनीति में भी प्रभावशाली स्थिति में थे। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के नेतृत्व वाली कांग्रेस (INC) की संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (UPA) सरकार संसद में वाम दलों के समर्थन पर टिकी थी। हालाँकि, भारत-अमेरिका परमाणु समझौते के मुद्दे पर वाम दलों ने समर्थन वापस ले लिया, जिससे सरकार को विश्वास मत का सामना करना पड़ा। उस दौर में वाम दल पश्चिम बंगाल, केरल और त्रिपुरा — तीन राज्यों में सत्ता में थे।

पतन की शुरुआत: नंदीग्राम से त्रिपुरा तक

पिछले एक दशक में वाम दलों का पतन तेज़ी से हुआ। 2011 में पश्चिम बंगाल में नंदीग्राम और सिंगूर जैसे मुद्दों पर जनता के व्यापक असंतोष ने ममता बनर्जी और तृणमूल कांग्रेस (TMC) के लिए रास्ता साफ कर दिया। 34 वर्षों के शासन का अंत हो गया।

2014 में केंद्र में भारतीय जनता पार्टी (BJP) के उभार के बाद 2018 में त्रिपुरा में भी वामपंथी किला ढह गया। 60 सदस्यीय विधानसभा में BJP ने 36 सीटें जीत लीं, जबकि वाम दलों की सीटें 50 से घटकर 16 रह गईं।

केरल: आखिरी गढ़ पर संकट

इन झटकों के बाद केरल वाम दलों का एकमात्र मज़बूत गढ़ बचा। 2016 में पिनाराई विजयन के नेतृत्व में LDF सत्ता में लौटा और 2021 में लगातार दूसरी बार जीत दर्ज कर परंपरा तोड़ी — केरल में आमतौर पर हर पाँच साल में सत्ता बदलती रही है। इस जीत ने वामपंथ को कुछ समय के लिए नई ऊर्जा दी।

अब ताज़ा रुझानों में कांग्रेस (INC) के नेतृत्व वाला यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट (UDF) अधिकांश सीटों पर बढ़त बनाए हुए है। तिरुवनंतपुरम में कांग्रेस कार्यकर्ताओं ने जश्न मनाना शुरू कर दिया है। गौरतलब है कि यह वही राज्य है जहाँ 1957 में दुनिया की पहली लोकतांत्रिक कम्युनिस्ट सरकार बनी थी।

आगे क्या: वामपंथ के लिए नया अध्याय

यदि केरल के रुझान अंतिम नतीजों में परिणत होते हैं, तो भारत में वाम राजनीति का एक युग समाप्त होगा। मतदाताओं का झुकाव पिछले कुछ वर्षों में केंद्र-दक्षिणपंथी दलों की ओर लगातार बढ़ा है। अब वाम दलों के सामने यह चुनौती होगी कि वे राज्य-स्तरीय सत्ता के बिना राष्ट्रीय राजनीति में अपनी प्रासंगिकता कैसे बनाए रखें। यह संकट महज़ चुनावी हार नहीं, बल्कि एक वैचारिक पुनर्विचार की माँग करता है।

संपादकीय दृष्टिकोण

त्रिपुरा में सांगठनिक जड़ता, और राष्ट्रीय स्तर पर BJP-विरोध की राजनीति में कांग्रेस की छाया में खो जाना — ये सब मिलकर इस पतन के कारण बने। सबसे बड़ा विरोधाभास यह है कि जो पार्टी 1957 में दुनिया को लोकतांत्रिक वामपंथ का रास्ता दिखाती थी, वह आज खुद अपनी प्रासंगिकता साबित करने में जूझ रही है। बिना राज्य की सत्ता के संगठन, संसाधन और जनाधार — तीनों पर संकट आना तय है।
RashtraPress
13 मई 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

केरल में LDF क्यों हार रही है?
ताज़ा रुझानों के अनुसार कांग्रेस नेतृत्व वाला UDF अधिकांश सीटों पर आगे है। केरल में परंपरागत रूप से हर पाँच साल में सत्ता बदलती रही है, और 2021 में LDF की लगातार दूसरी जीत अपवाद थी। सत्ता-विरोधी लहर और स्थानीय मुद्दे इस बदलाव के प्रमुख कारण बताए जा रहे हैं।
1970 के बाद पहली बार वाम दलों के पास कोई राज्य नहीं होगा, इसका क्या मतलब है?
इसका अर्थ है कि CPI-M और उसके सहयोगी दल — जो कभी पश्चिम बंगाल, केरल और त्रिपुरा में सत्ता में थे — अब किसी भी राज्य में सरकार नहीं बना पाएंगे। राज्य-स्तरीय सत्ता के बिना संगठनात्मक ढाँचा, वित्तीय संसाधन और जनाधार बनाए रखना कठिन हो जाता है।
भारत में वाम दलों का पतन कब से शुरू हुआ?
वाम दलों के पतन की शुरुआत मुख्य रूप से 2011 में पश्चिम बंगाल में हार से हुई, जहाँ नंदीग्राम और सिंगूर के मुद्दों पर जनाक्रोश ने TMC को सत्ता दिलाई। इसके बाद 2018 में त्रिपुरा में BJP ने 36 सीटें जीतकर वाम दलों को 16 सीटों पर समेट दिया।
ज्योति बसु को PM बनने से क्यों रोका गया था?
1996 में यूनाइटेड फ्रंट सरकार के तहत ज्योति बसु को प्रधानमंत्री पद का प्रस्ताव मिला था, लेकिन CPI-M के पोलित ब्यूरो ने इसे अस्वीकार कर दिया। बाद में ज्योति बसु ने स्वयं इस फैसले को 'ऐतिहासिक भूल' बताया था।
केरल के बाद वाम दलों का भविष्य क्या होगा?
केरल की संभावित हार के बाद वाम दलों के सामने राष्ट्रीय राजनीति में प्रासंगिकता बनाए रखने की बड़ी चुनौती होगी। राज्य-स्तरीय सत्ता के बिना संगठन और संसाधन दोनों पर दबाव बढ़ेगा, और पार्टी को वैचारिक पुनर्मूल्यांकन की ज़रूरत पड़ सकती है।
राष्ट्र प्रेस
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