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जमीयत उलेमा-ए-हिंद ने 'डेमोग्राफिक जिहाद' नैरेटिव को बताया भ्रामक, UCC और जनसांख्यिकी समिति पर उठाए सवाल

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जमीयत उलेमा-ए-हिंद ने 'डेमोग्राफिक जिहाद' नैरेटिव को बताया भ्रामक, UCC और जनसांख्यिकी समिति पर उठाए सवाल

सारांश

जमीयत उलेमा-ए-हिंद ने नूंह में 3,000 से अधिक उलमा की बैठक में 'डेमोग्राफिक जिहाद' के नैरेटिव को आँकड़ों के आधार पर भ्रामक करार दिया, गृह मंत्रालय की जनसांख्यिकी समिति को अवैज्ञानिक बताया और UCC को सर्वोच्च न्यायालय तक चुनौती देने का ऐलान किया।

मुख्य बातें

जमीयत उलेमा-ए-हिंद की राष्ट्रीय कार्यकारिणी बैठक 30–31 अक्टूबर 2026 को नूंह, हरियाणा में हुई, जिसमें 3,000 से अधिक उलमा शामिल हुए।
कार्यकारिणी ने 'डेमोग्राफिक जिहाद' के नैरेटिव को भ्रामक बताया; NFHS आँकड़े उद्धृत किए — मुस्लिम दशकीय वृद्धि दर 32.9% (1981–91) से घटकर 24.7% (2001–11) हुई।
गृह मंत्रालय की 26 मई 2026 को गठित जनसांख्यिकी समिति को पक्षपातपूर्ण और अवैज्ञानिक बताया; एक भी जनसांख्यिकीविद् न होने पर आपत्ति।
गुजरात, उत्तराखंड और असम में लागू UCC के विरुद्ध प्रस्ताव पारित; अनुच्छेद 14, 25 और 26 के हनन का आरोप।
UCC को उच्च न्यायालयों और सर्वोच्च न्यायालय में समन्वित कानूनी चुनौती देने का निर्णय; राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री सहित राज्यपालों को ज्ञापन सौंपे जाएंगे।
मौलाना महमूद असद मदनी ने गृह मंत्री अमित शाह से सीधे पूछा — अवैध घुसपैठ रोकने की जिम्मेदारी उनके मंत्रालय की है, जवाबदेही क्यों नहीं।

जमीयत उलेमा-ए-हिंद की दो दिवसीय राष्ट्रीय कार्यकारिणी बैठक में 30 और 31 अक्टूबर 2026 को हरियाणा के नूंह (मेवात) में देशभर से आए 3,000 से अधिक उलमा ने भाग लिया और 'डेमोग्राफिक जिहाद' के नैरेटिव को भ्रामक करार देते हुए सरकार की जवाबदेही पर तीखे सवाल उठाए। बैठक में संवैधानिक अधिकारों, धार्मिक स्वतंत्रता, समान नागरिक संहिता (UCC) और गृह मंत्रालय की जनसांख्यिकी समिति सहित कई मुद्दों पर प्रस्ताव पारित किए गए।

मुख्य घटनाक्रम और प्रस्ताव

कार्यकारिणी ने भारत में जनसांख्यिकीय बदलावों को लेकर फैलाए जा रहे 'डेमोग्राफिक जिहाद' के आरोपों के विरुद्ध एक विस्तृत प्रस्ताव पारित किया। प्रस्ताव में इस दावे को सिरे से खारिज किया गया कि मुसलमान जनसंख्या वृद्धि या अवैध घुसपैठ के ज़रिये देश का जनसांख्यिकीय संतुलन बदलने का प्रयास कर रहे हैं।

जनगणना के आँकड़ों, राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण (NFHS) और अन्य वैज्ञानिक साक्ष्यों का हवाला देते हुए प्रस्ताव में कहा गया कि 1981–1991 के दौरान मुस्लिम आबादी की दशकीय वृद्धि दर 32.9% थी, जो 2001–2011 में घटकर 24.7% रह गई। प्रस्ताव के अनुसार जनसंख्या में होने वाले बदलावों का विश्लेषण सामाजिक, शैक्षिक और आर्थिक परिस्थितियों के संदर्भ में किया जाना चाहिए, न कि उन्हें अवैध घुसपैठ से जोड़कर सांप्रदायिक सुरक्षा का मुद्दा बनाया जाए।

जनसांख्यिकी समिति पर आपत्ति

कार्यकारिणी ने गृह मंत्रालय द्वारा 26 मई 2026 को गठित उच्चस्तरीय जनसांख्यिकी समिति की संरचना पर गंभीर सवाल उठाए। प्रस्ताव में कहा गया कि समिति में एक भी विशेषज्ञ जनसांख्यिकीविद् शामिल नहीं है और इसका गठन इस पूर्वधारणा के आधार पर किया गया है कि जनसांख्यिकीय बदलावों का प्रमुख कारण अवैध घुसपैठ है।

कार्यकारिणी ने इस दृष्टिकोण को पक्षपातपूर्ण और अवैज्ञानिक बताते हुए माँग की कि सरकार अंतरराष्ट्रीय स्तर के प्रतिष्ठित विशेषज्ञों को शामिल कर एक स्वतंत्र और निष्पक्ष आयोग गठित करे, जो प्रवासन, शिक्षा, रोज़गार और सामाजिक-आर्थिक परिस्थितियों सहित सभी पहलुओं का वैज्ञानिक अध्ययन करे।

UCC पर विरोध और संवैधानिक सवाल

कार्यकारिणी ने गुजरात, उत्तराखंड और असम में लागू समान नागरिक संहिता (UCC) के विरुद्ध भी प्रस्ताव पारित किया। जमीयत ने UCC को मुसलमानों की धार्मिक स्वतंत्रता, पारिवारिक मामलों में स्वायत्तता और संविधान द्वारा प्रदत्त मौलिक अधिकारों के लिए गंभीर चुनौती बताया।

कार्यकारिणी ने UCC के प्रावधानों में भेदभाव का आरोप लगाते हुए कहा कि उत्तराखंड और गुजरात में अनुसूचित जनजातियों (ST) को उनके रीति-रिवाजों की रक्षा के नाम पर कानून के दायरे से बाहर रखा गया है, जबकि मुसलमानों को अनिवार्य रूप से इसके दायरे में लाया गया है। प्रस्ताव के अनुसार यह दोहरा रवैया संविधान के अनुच्छेद 14, 25 और 26 से जुड़े गंभीर संवैधानिक प्रश्न खड़े करता है।

गौरतलब है कि जमीयत ने ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड और अन्य मुस्लिम संगठनों के साथ-साथ सिख, ईसाई, दलित और आदिवासी संगठनों के साथ समन्वय स्थापित कर संविधान की रक्षा के लिए व्यापक राष्ट्रीय आवाज़ बुलंद करने का आह्वान किया। उत्तराखंड, गुजरात और असम में लागू UCC कानूनों को उच्च न्यायालयों और सर्वोच्च न्यायालय में चुनौती देने की कानूनी कार्रवाइयों को अधिक समन्वित ढंग से आगे बढ़ाने का निर्णय भी लिया गया।

मदनी का बयान और सरकार पर निशाना

जमीयत उलेमा-ए-हिंद के अध्यक्ष मौलाना महमूद असद मदनी ने बैठक को संबोधित करते हुए केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह पर सीधा निशाना साधा। उन्होंने सवाल उठाया कि अवैध घुसपैठ रोकने की जिम्मेदारी जिस मंत्रालय की है, उसकी जवाबदेही तय करने के बजाय मुसलमानों को राजनीतिक रूप से निशाना क्यों बनाया जा रहा है।

मदनी ने बहुसंख्यक समुदाय के खतरे में होने के राजनीतिक नैरेटिव को भी चुनौती देते हुए कहा, 'आज़ादी से पहले, जब देश औपनिवेशिक शासन के अधीन था, तब किसी ने यह दावा नहीं किया कि बहुसंख्यक समुदाय खतरे में है — लेकिन आज़ादी और धर्मनिरपेक्ष संविधान अपनाए जाने के बाद अचानक यह अभियान शुरू हो गया। सच्चाई यह है कि खतरे में बहुसंख्यक समुदाय नहीं, बल्कि सत्ता और राजनीतिक पदों की भूख है।'

आगे क्या होगा

कार्यकारिणी के निर्णय के अनुसार राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, केंद्रीय कानून मंत्री तथा संबंधित राज्यों के राज्यपालों और मुख्यमंत्रियों को विस्तृत ज्ञापन सौंपे जाएंगे। इनमें संविधान के अनुच्छेद 14, 25 और 26, जनजातीय समुदायों को दी गई छूट से उत्पन्न असमानता तथा मुस्लिम पर्सनल लॉ के धार्मिक आधार को दस्तावेज़ी साक्ष्यों के साथ प्रस्तुत किया जाएगा। यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि सरकार इन माँगों पर किस प्रकार की प्रतिक्रिया देती है और सर्वोच्च न्यायालय में UCC संबंधी याचिकाओं पर सुनवाई किस दिशा में जाती है।

संपादकीय दृष्टिकोण

संस्थागत मोड़ ले चुकी है — गृह मंत्रालय की जनसांख्यिकी समिति का गठन इस पूर्वधारणा की आधिकारिक स्वीकृति जैसा दिखता है। जमीयत का NFHS और जनगणना आँकड़ों पर आधारित खंडन तथ्यात्मक रूप से सुसंगत है, लेकिन असली सवाल यह है कि एक ऐसी समिति जिसमें कोई जनसांख्यिकी विशेषज्ञ नहीं है, वह किस वैज्ञानिक आधार पर नीतिगत सिफारिशें देगी। UCC में ST को छूट और मुसलमानों को अनिवार्य दायरे में रखने की असमानता एक वैध संवैधानिक प्रश्न है जिसे सर्वोच्च न्यायालय को ही सुलझाना होगा — और इस पर मुख्यधारा की बहस अभी तक उतनी गहरी नहीं हुई जितनी होनी चाहिए।
RashtraPress
1 नवंबर 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

'डेमोग्राफिक जिहाद' पर जमीयत का क्या रुख है?
जमीयत उलेमा-ए-हिंद ने 'डेमोग्राफिक जिहाद' के नैरेटिव को पूरी तरह भ्रामक और राजनीति से प्रेरित बताया है। NFHS और जनगणना आँकड़ों का हवाला देते हुए कार्यकारिणी ने कहा कि मुस्लिम दशकीय वृद्धि दर 1981–91 के 32.9% से घटकर 2001–11 में 24.7% रह गई, जो जनसंख्या विस्फोट के दावों को खारिज करती है।
गृह मंत्रालय की जनसांख्यिकी समिति पर जमीयत की आपत्ति क्या है?
जमीयत ने 26 मई 2026 को गठित इस उच्चस्तरीय समिति को अवैज्ञानिक और पक्षपातपूर्ण बताया है। आपत्ति यह है कि समिति में एक भी विशेषज्ञ जनसांख्यिकीविद् नहीं है और इसका गठन इस पूर्वधारणा पर हुआ है कि जनसांख्यिकीय बदलाव का प्रमुख कारण अवैध घुसपैठ है। जमीयत ने अंतरराष्ट्रीय विशेषज्ञों के साथ एक स्वतंत्र आयोग गठित करने की माँग की है।
जमीयत UCC के विरुद्ध कानूनी लड़ाई कैसे लड़ेगी?
जमीयत ने उत्तराखंड, गुजरात और असम में लागू UCC कानूनों को उच्च न्यायालयों और सर्वोच्च न्यायालय में चुनौती देने का निर्णय लिया है। इसके अतिरिक्त राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, केंद्रीय कानून मंत्री और संबंधित राज्यों के राज्यपालों को अनुच्छेद 14, 25, 26 के हनन का दस्तावेज़ी साक्ष्य-सहित ज्ञापन सौंपा जाएगा।
UCC में अनुसूचित जनजातियों को छूट पर जमीयत क्या कह रही है?
जमीयत की आपत्ति है कि उत्तराखंड और गुजरात में ST समुदायों को उनकी परंपराओं की रक्षा के नाम पर UCC के दायरे से बाहर रखा गया है, जबकि मुसलमानों को अनिवार्य रूप से इसके अधीन किया गया है। कार्यकारिणी ने इसे दोहरा रवैया बताते हुए संविधान के अनुच्छेद 14 (समानता) का उल्लंघन कहा है।
मौलाना मदनी ने गृह मंत्री अमित शाह से क्या सवाल किया?
मौलाना महमूद असद मदनी ने सवाल उठाया कि अवैध घुसपैठ रोकना गृह मंत्रालय की संवैधानिक जिम्मेदारी है, तो इस विफलता के लिए मंत्रालय की जवाबदेही तय करने के बजाय मुसलमानों को राजनीतिक निशाना क्यों बनाया जा रहा है। उन्होंने यह भी कहा कि बहुसंख्यक समुदाय के खतरे में होने का नैरेटिव सत्ता की राजनीतिक भूख से प्रेरित है।
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