4 नवंबर 2026
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झारखंड हाई कोर्ट का बड़ा फैसला: 3 सेकंड देरी पर डिस्क्वालिफाई दिव्यांग अभ्यर्थी को मिलेगी चौकीदार नियुक्ति

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झारखंड हाई कोर्ट का बड़ा फैसला: 3 सेकंड देरी पर डिस्क्वालिफाई दिव्यांग अभ्यर्थी को मिलेगी चौकीदार नियुक्ति

सारांश

लिखित परीक्षा पास करने के बाद महज 3 सेकंड की देरी ने एक दिव्यांग अभ्यर्थी की सरकारी नौकरी छीन ली थी। झारखंड हाई कोर्ट ने फैसला सुनाया कि बिना उचित सुविधा के यह अयोग्यता गैरकानूनी है — और 8 हफ्तों में नियुक्ति का आदेश दे दिया।

मुख्य बातें

झारखंड हाई कोर्ट ने दौड़ में 3 सेकंड की देरी पर डिस्क्वालिफाई किए गए दिव्यांग अभ्यर्थी को चौकीदार पद पर नियुक्ति का अधिकार दिया।
मामला दुमका जिले के विज्ञापन संख्या 01/2025 के तहत 328 पदों की भर्ती से जुड़ा है।
अभ्यर्थी ने दौड़ 10 मिनट 3 सेकंड में पूरी की; दिव्यांगता के लिए कोई अतिरिक्त समय नहीं दिया गया था।
कोर्ट ने दिव्यांगजन अधिकार अधिनियम, 2016 की धारा 2(वाई) और धारा 20 के तहत 'उचित सुविधा' को वैधानिक अधिकार माना।
दुमका में दिव्यांग कोटे के 13 में से 11 पद अभी भी रिक्त हैं।
राज्य सरकार को 8 सप्ताह के भीतर नियुक्ति पत्र जारी करने का निर्देश दिया गया।

झारखंड हाई कोर्ट ने 4 नवंबर 2026 को एक ऐतिहासिक फैसले में स्पष्ट किया कि दुमका के एक दिव्यांग अभ्यर्थी को शारीरिक दौड़ में महज 3 सेकंड की देरी के आधार पर सरकारी नौकरी से वंचित नहीं किया जा सकता, जब तक उसे दिव्यांगता के अनुरूप उचित सुविधाएँ न दी गई हों। अदालत ने झारखंड राज्य सरकार को 8 सप्ताह के भीतर अभ्यर्थी को नियुक्ति पत्र जारी करने का आदेश दिया है।

मामले की पृष्ठभूमि

यह विवाद दुमका जिले में विज्ञापन संख्या 01/2025 के तहत चौकीदार के 328 पदों पर भर्ती प्रक्रिया से जुड़ा है। याचिकाकर्ता दिव्यांग श्रेणी से आते हैं और लिखित परीक्षा में सफलतापूर्वक उत्तीर्ण हुए थे। लिखित परीक्षा पास करने के बाद उन्हें शारीरिक दक्षता परीक्षा में सम्मिलित किया गया, जहाँ उन्हें सामान्य अभ्यर्थियों के साथ दौड़ में शामिल किया गया।

अभ्यर्थी ने दौड़ 10 मिनट 3 सेकंड में पूरी की, परंतु निर्धारित समय-सीमा से केवल 3 सेकंड अधिक होने के कारण उन्हें अयोग्य घोषित कर दिया गया। आरोप है कि दौड़ के दौरान उन्हें दिव्यांगजन अधिकार अधिनियम, 2016 के अंतर्गत अनिवार्य 'उचित सुविधाएँ' — जैसे अतिरिक्त समय — न तो दी गईं और न ही कोई विशेष व्यवस्था की गई।

अदालत में अभ्यर्थी के तर्क

याचिकाकर्ता की ओर से अधिवक्ता शुभम मिश्रा ने अदालत में तर्क रखा कि दिव्यांगजन अधिकार अधिनियम, 2016 की धारा 2(वाई) और धारा 20 के तहत दिव्यांग व्यक्तियों को उचित सुविधाएँ उपलब्ध कराना सरकार की वैधानिक ज़िम्मेदारी है। उन्होंने सर्वोच्च न्यायालय के महत्वपूर्ण निर्णय 'विकास कुमार बनाम संघ लोक सेवा आयोग' का भी हवाला दिया, जिसमें उचित सुविधा को दिव्यांग व्यक्तियों के मौलिक अधिकारों से जोड़ा गया है।

सरकार का पक्ष और हाई कोर्ट का रुख

राज्य सरकार की ओर से यह दलील दी गई कि भर्ती नियमों में दिव्यांग अभ्यर्थियों को अतिरिक्त समय देने का कोई प्रावधान नहीं है। हालाँकि, अदालत ने इस तर्क को सिरे से खारिज कर दिया। न्यायालय ने स्पष्ट किया कि कोई भी भर्ती नियम या सरकारी अधिसूचना संसद द्वारा पारित कानून के प्रावधानों के विरुद्ध नहीं हो सकती। दिव्यांग अभ्यर्थी को उचित सुविधा से वंचित करना कानून की मूल भावना के अनुकूल नहीं है।

गौरतलब है कि अदालत ने यह तथ्य भी संज्ञान में लिया कि दुमका में दिव्यांग श्रेणी के लिए आरक्षित 13 पदों में से 11 पद अभी भी रिक्त हैं — यानी नियुक्ति देने में कोई व्यावहारिक बाधा भी नहीं थी।

आम दिव्यांग अभ्यर्थियों पर असर

यह फैसला केवल इस एक अभ्यर्थी तक सीमित नहीं है। यह झारखंड और देश भर की भर्ती एजेंसियों के लिए एक स्पष्ट संदेश है कि दिव्यांगजन अधिकार कानून के प्रावधान केवल लिखित परीक्षाओं तक नहीं, बल्कि शारीरिक परीक्षाओं पर भी समान रूप से लागू होते हैं। यह ऐसे समय में आया है जब सरकारी भर्तियों में दिव्यांग कोटे के रिक्त रहने की समस्या राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा में है।

आगे की राह

अदालत के आदेश के अनुसार, झारखंड राज्य सरकार को 8 सप्ताह के भीतर याचिकाकर्ता को चौकीदार पद पर नियुक्ति पत्र जारी करना होगा। यह मामला भविष्य में दिव्यांग अभ्यर्थियों के लिए न्यायिक नज़ीर के रूप में उपयोग में आ सकता है।

संपादकीय दृष्टिकोण

बल्कि पूरी प्रक्रिया की नीयत और तैयारी की है। राज्य सरकार का यह तर्क कि 'नियमों में प्रावधान नहीं है', संसद के कानून के सामने टिकता नहीं — फिर भी ऐसे तर्क बार-बार दिए जाते हैं और अभ्यर्थियों को कोर्ट का दरवाज़ा खटखटाने पर मजबूर किया जाता है। असली सवाल यह है कि क्या सरकारें स्वयं अपनी भर्ती प्रक्रियाओं को कानून के अनुरूप बनाएँगी, या हर दिव्यांग अभ्यर्थी को न्यायालय में जाने के लिए बाध्य होना पड़ेगा?
RashtraPress
4 नवंबर 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

झारखंड हाई कोर्ट ने दिव्यांग चौकीदार अभ्यर्थी के बारे में क्या फैसला दिया?
झारखंड हाई कोर्ट ने फैसला दिया कि दौड़ में 3 सेकंड की देरी के आधार पर दिव्यांग अभ्यर्थी को अयोग्य घोषित करना गैरकानूनी है, क्योंकि उसे दिव्यांगता के अनुरूप उचित सुविधाएँ नहीं दी गई थीं। अदालत ने राज्य सरकार को 8 सप्ताह के भीतर नियुक्ति पत्र जारी करने का आदेश दिया।
दिव्यांगजन अधिकार अधिनियम 2016 के तहत 'उचित सुविधा' का क्या अर्थ है?
दिव्यांगजन अधिकार अधिनियम, 2016 की धारा 2(वाई) के अंतर्गत 'उचित सुविधा' का अर्थ है — दिव्यांग व्यक्ति को किसी कार्य या प्रक्रिया में समान अवसर सुनिश्चित करने के लिए आवश्यक संशोधन या समायोजन, जैसे शारीरिक परीक्षा में अतिरिक्त समय। धारा 20 सरकारी भर्ती में इसे अनिवार्य बनाती है।
यह भर्ती मामला किस जिले से जुड़ा है और कितने पद हैं?
यह मामला झारखंड के दुमका जिले में विज्ञापन संख्या 01/2025 के तहत चौकीदार के 328 पदों की भर्ती से जुड़ा है। दिव्यांग श्रेणी के लिए 13 पद आरक्षित हैं, जिनमें से 11 अभी भी रिक्त हैं।
राज्य सरकार ने अदालत में क्या तर्क दिया और कोर्ट ने उसे क्यों खारिज किया?
राज्य सरकार ने कहा कि भर्ती नियमों में दिव्यांग अभ्यर्थियों को अतिरिक्त समय देने का प्रावधान नहीं है। हाई कोर्ट ने यह तर्क अस्वीकार करते हुए स्पष्ट किया कि कोई भी भर्ती नियम या अधिसूचना संसद द्वारा बनाए गए कानून के विरुद्ध नहीं हो सकती।
इस फैसले का अन्य दिव्यांग सरकारी नौकरी के अभ्यर्थियों पर क्या असर पड़ेगा?
यह फैसला भविष्य की भर्ती प्रक्रियाओं में न्यायिक नज़ीर के रूप में उपयोग हो सकता है, जिसमें शारीरिक परीक्षाओं के दौरान भी दिव्यांग अभ्यर्थियों को उचित सुविधाएँ देना अनिवार्य माना जाएगा। यह सुप्रीम कोर्ट के 'विकास कुमार बनाम UPSC' फैसले को और मज़बूत करता है।
राष्ट्र प्रेस
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