फर्जी सर्विस बुक घोटाला: क्राइम ब्रांच ने पीडीडी मामले में दाखिल की चार्जशीट, तीन आरोपी
सारांश
Key Takeaways
- जम्मू-कश्मीर क्राइम ब्रांच की ईओडब्ल्यू ने पीडीडी फर्जी नियुक्ति घोटाले में एंटी-करप्शन कोर्ट, बारामूला में चार्जशीट दाखिल की।
- नासिर अहमद मीर पर आरोप है कि उन्होंने 1994 के एसआरओ-43 के नाम पर जाली नियुक्ति आदेश से सरकारी नौकरी हासिल की।
- मुश्ताक अहमद मलिक (केपीडीसीएल, सीनियर असिस्टेंट) ने फर्जी सर्विस बुक तैयार की, जिसकी पुष्टि फोरेंसिक जांच से हुई।
- केपीडीसीएल/ईडी सुंबल के एक दिवंगत पूर्व एग्जीक्यूटिव इंजीनियर ने 2009 में बिना सत्यापन के वेतन जारी करवाया।
- आरोपियों पर आरपीसी की धारा 420, 468, 471 और 120-बी तथा भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के तहत मामला दर्ज।
- मामला अब न्यायिक निर्णय के लिए अदालत में लंबित है।
श्रीनगर, 25 अप्रैल। फर्जी सर्विस बुक और जाली नियुक्ति आदेश से जुड़े बड़े घोटाले में जम्मू-कश्मीर क्राइम ब्रांच की इकोनॉमिक ऑफेंस विंग (ईओडब्ल्यू) ने एंटी-करप्शन कोर्ट, बारामूला में चार्जशीट दाखिल कर दी है। यह मामला पावर डेवलपमेंट डिपार्टमेंट (पीडीडी) में फर्जी तरीके से नौकरी हासिल करने और सरकारी दस्तावेजों में हेराफेरी से जुड़ा है। इस मामले में तीन आरोपियों को नामजद किया गया है।
क्या है पूरा मामला?
क्राइम ब्रांच के अनुसार, यह मामला एक लिखित शिकायत के आधार पर एफआईआर नंबर 46/2023 के तहत दर्ज किया गया था, जिसमें पावर डेवलपमेंट डिपार्टमेंट में फर्जी नियुक्तियों का गंभीर आरोप लगाया गया था। जांच में खुलासा हुआ कि नासिर अहमद मीर, निवासी कुनान बाबागुंड, बांदीपोरा, ने एक जाली नियुक्ति आदेश के बल पर सरकारी नौकरी हथिया ली थी।
यह कथित नियुक्ति आदेश 1994 के एसआरओ-43 के तहत जारी बताया गया था, लेकिन जांच में पाया गया कि वह आदेश सरकारी रिकॉर्ड से पूरी तरह गायब था। इसके साथ ही, नियुक्ति आदेश जारी होने से संबंधित कोई भी सरकारी डिस्पैच या रसीद का रिकॉर्ड भी उपलब्ध नहीं था।
जाली सर्विस बुक और फोरेंसिक साक्ष्य
जांच में सामने आया कि मुश्ताक अहमद मलिक, निवासी अरागम, बांदीपोरा, जो उस समय केपीडीसीएल में सीनियर असिस्टेंट के पद पर कार्यरत थे, ने नासिर अहमद मीर के लिए एक जाली सर्विस बुक तैयार की। इस सर्विस बुक में गलत तरीके से दर्शाया गया था कि नासिर की नियुक्ति एसआरओ-43 के तहत हुई है।
फोरेंसिक जांच ने इस बात की पुष्टि की कि सर्विस बुक में की गई सभी प्रविष्टियां और हस्ताक्षर मुश्ताक अहमद मलिक के ही हैं। इसके अलावा, उस समय के तहसीलदार, बांदीपोरा द्वारा किए गए सत्यापन में यह भी स्पष्ट हो गया कि नासिर अहमद मीर एसआरओ-43 के तहत नियुक्ति के लिए पात्र ही नहीं थे, क्योंकि उनके परिवार की परिस्थितियां इसके लिए आवश्यक शर्तें पूरी नहीं करती थीं।
तीसरे आरोपी की भूमिका और आपराधिक साजिश
चार्जशीट में तीसरे आरोपी के रूप में केपीडीसीएल/ईडी सुंबल के एक दिवंगत पूर्व एग्जीक्यूटिव इंजीनियर (जो जम्मू के निवासी थे) का नाम शामिल है। जांच में पाया गया कि उन्होंने 2009 में, कथित नियुक्ति की तारीख के तीन वर्षों से भी अधिक समय बाद, बिना किसी उचित सत्यापन के नासिर अहमद मीर का वेतन जारी करवाने में मदद की।
यह तथ्य इस ओर इशारा करता है कि यह एक सुनियोजित आपराधिक साजिश थी, जिसमें जालसाजी, धोखाधड़ी और सरकारी पद का दुरुपयोग शामिल था। इस साजिश के चलते सरकारी खजाने को वर्षों तक नुकसान उठाना पड़ा।
आरोप और कानूनी कार्रवाई
आरोपियों के खिलाफ आरपीसी की धारा 420 (धोखाधड़ी), 468 (जालसाजी), 471 (जाली दस्तावेज का उपयोग) और 120-बी (आपराधिक षड्यंत्र) के तहत मामला दर्ज किया गया है। इसके अतिरिक्त, सरकारी कर्मचारियों पर भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के प्रासंगिक प्रावधान भी लागू किए गए हैं।
क्राइम ब्रांच ने स्पष्ट किया है कि चार्जशीट को न्यायिक निर्णय के लिए अदालत में जमा कर दिया गया है।
व्यापक संदर्भ और प्रभाव
गौरतलब है कि जम्मू-कश्मीर में सरकारी विभागों में फर्जी नियुक्तियों के मामले पहले भी सामने आते रहे हैं। ईओडब्ल्यू पिछले कुछ वर्षों में ऐसे कई घोटालों की जांच कर रही है, जिनमें सरकारी कर्मचारियों की मिलीभगत से फर्जी दस्तावेजों के जरिए नौकरियां हासिल की गईं। यह मामला इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि इसमें एक वरिष्ठ इंजीनियर स्तर के अधिकारी की संलिप्तता सामने आई है, जो यह दर्शाता है कि भ्रष्टाचार की जड़ें सिर्फ निचले स्तर तक सीमित नहीं हैं।
इस मामले में अदालत का फैसला आने वाले महीनों में अपेक्षित है, जो जम्मू-कश्मीर में सरकारी भर्ती प्रक्रिया की पारदर्शिता को लेकर एक महत्वपूर्ण मिसाल कायम कर सकता है।