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शीतला अष्टमी पर मां कल्याणी देवी मंदिर में उमड़े हजारों श्रद्धालु, 150 वर्ष पुरानी परंपरा का निर्वाह

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शीतला अष्टमी पर मां कल्याणी देवी मंदिर में उमड़े हजारों श्रद्धालु, 150 वर्ष पुरानी परंपरा का निर्वाह

सारांश

प्रयागराज के शक्तिपीठ मां कल्याणी देवी मंदिर में शीतला अष्टमी पर हजारों श्रद्धालु उमड़े। 150 वर्ष पुरानी बसौड़ा परंपरा के तहत सप्तमी को बना भोजन अष्टमी पर भोग लगाया गया — यह आस्था और सांस्कृतिक निरंतरता का जीवंत उदाहरण है।

मुख्य बातें

8 जुलाई 2025 को प्रयागराज के मां कल्याणी देवी मंदिर में शीतला अष्टमी पर विशेष पूजा-अर्चना हुई।
वर्ष में चार शीतला अष्टमी मनाई जाती हैं — चैत्र, वैशाख, ज्येष्ठ और आषाढ़ मास में।
बसौड़ा परंपरा के अनुसार अष्टमी के दिन चूल्हा नहीं जलाया जाता; सप्तमी की रात बना हलवा-पूरी ही प्रसाद होता है।
यह परंपरा इस धाम में पिछले करीब 150 वर्षों से अनवरत चली आ रही है।
प्रशासन ने भीड़ प्रबंधन और सुरक्षा के लिए विशेष व्यवस्था की।

प्रयागराज के शक्तिपीठ मां कल्याणी देवी मंदिर में 8 जुलाई 2025 को शीतला अष्टमी के पावन पर्व पर विशेष पूजा-अर्चना और धार्मिक अनुष्ठानों का भव्य आयोजन हुआ। हजारों की संख्या में श्रद्धालु मंदिर पहुँचे और मां भगवती के दर्शन कर परिवार की सुख-समृद्धि एवं आरोग्य की प्रार्थना की। सुबह से ही भक्तों की लंबी कतारें मंदिर परिसर में देखी गईं।

शीतला अष्टमी की परंपरा और महत्व

शक्तिपीठ मां कल्याणी देवी मंदिर के महासचिव पंडित श्याम जी पाठक ने बताया कि इस धाम में शीतला अष्टमी का विशेष धार्मिक महत्व है। उनके अनुसार यहाँ वर्ष में चार शीतला अष्टमी मनाई जाती हैं, जो चैत्र, वैशाख, ज्येष्ठ और आषाढ़ मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को पड़ती हैं। यह धार्मिक अनुष्ठान-क्रम चैत्र मास से आरंभ होकर आषाढ़ अष्टमी पर संपन्न होता है।

व्रत और बसौड़ा की रीत

पंडित श्याम जी पाठक ने बताया कि शीतला अष्टमी पर माताएं अपने पुत्रों और पतियों की दीर्घायु, उत्तम स्वास्थ्य एवं परिवार की खुशहाली के लिए सप्तमी तिथि को व्रत रखती हैं। व्रत के नियम के अनुसार सप्तमी की रात को हलवा-पूरी तैयार की जाती है और अष्टमी के दिन वही भोजन मां शीतला को भोग के रूप में अर्पित किया जाता है। इसके बाद परिवार के सभी सदस्य उसे प्रसाद के रूप में ग्रहण करते हैं।

उन्होंने बताया कि इस परंपरा के अंतर्गत अनेक घरों में अष्टमी के दिन चूल्हा नहीं जलाया जाता — सप्तमी को बना भोजन ही सारे दिन प्रसाद के रूप में खाया जाता है। इसी विशेषता के कारण इस पर्व को बसौड़ा या बसिवटा अष्टमी भी कहा जाता है।

150 वर्ष पुरानी अटूट आस्था

पंडित श्याम जी पाठक के अनुसार तीर्थराज प्रयाग स्थित मां कल्याणी देवी धाम में यह परंपरा पिछले करीब 150 वर्षों से अनवरत चली आ रही है। पूर्वजों के समय से प्रवाहित यह धार्मिक धारा आज भी उसी श्रद्धा और विधि-विधान के साथ जीवित है, जो इस शक्तिपीठ की आस्था की गहराई को रेखांकित करती है।

प्रशासन की व्यवस्था और श्रद्धालुओं का उत्साह

शीतला अष्टमी के अवसर पर मंदिर में उमड़ी भीड़ को देखते हुए प्रशासन की ओर से भीड़ प्रबंधन और सुरक्षा के लिए विशेष इंतज़ाम किए गए, ताकि श्रद्धालुओं को दर्शन में कोई असुविधा न हो। भक्तों ने विशेष पूजा-अर्चना में भाग लिया और मां कल्याणी देवी से परिवार की सुख-शांति का आशीर्वाद माँगा। यह पर्व प्रयागराज की सांस्कृतिक-धार्मिक पहचान का एक अभिन्न अंग बना हुआ है।

संपादकीय दृष्टिकोण

विशेष रूप से उत्तर भारत के तीर्थ नगरों में। मां कल्याणी देवी धाम की 150 वर्षीय परंपरा केवल आस्था का प्रतीक नहीं, बल्कि सामूहिक स्मृति और सांस्कृतिक पहचान का संवाहक भी है। यह ध्यान देने योग्य है कि बसौड़ा जैसी रीतें पर्यावरणीय दृष्टि से भी प्रासंगिक हैं — एक दिन चूल्हा न जलाने की परंपरा ऊर्जा संरक्षण का प्राचीन रूप है। ऐसे पर्वों की मीडिया कवरेज अक्सर भीड़ के आँकड़ों तक सिमट जाती है, जबकि इनके सामाजिक-सांस्कृतिक आयाम कहीं अधिक गहरे हैं।
RashtraPress
8 जुलाई 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

शीतला अष्टमी क्या है और यह क्यों मनाई जाती है?
शीतला अष्टमी मां शीतला को समर्पित एक हिंदू पर्व है, जो कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को मनाया जाता है। माताएं इस दिन अपने पुत्रों और पतियों की दीर्घायु, अच्छे स्वास्थ्य और परिवार की खुशहाली के लिए व्रत रखती हैं।
बसौड़ा या बसिवटा अष्टमी किसे कहते हैं?
बसौड़ा शीतला अष्टमी का ही एक नाम है। इस परंपरा में अष्टमी के दिन घर में चूल्हा नहीं जलाया जाता और सप्तमी की रात तैयार हलवा-पूरी को ही भोग और प्रसाद के रूप में ग्रहण किया जाता है।
मां कल्याणी देवी मंदिर में वर्ष में कितनी बार शीतला अष्टमी मनाई जाती है?
पंडित श्याम जी पाठक के अनुसार मां कल्याणी देवी धाम में वर्ष में चार बार शीतला अष्टमी मनाई जाती है — चैत्र, वैशाख, ज्येष्ठ और आषाढ़ मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को। यह अनुष्ठान-क्रम चैत्र से शुरू होकर आषाढ़ में समाप्त होता है।
मां कल्याणी देवी मंदिर में यह परंपरा कब से चली आ रही है?
मंदिर के महासचिव पंडित श्याम जी पाठक के अनुसार तीर्थराज प्रयाग स्थित इस धाम में शीतला अष्टमी की परंपरा पिछले करीब 150 वर्षों से अनवरत चली आ रही है।
शीतला अष्टमी पर प्रयागराज में प्रशासन ने क्या व्यवस्था की?
8 जुलाई 2025 को मां कल्याणी देवी मंदिर में उमड़ी भारी भीड़ को देखते हुए प्रशासन ने भीड़ प्रबंधन और सुरक्षा के लिए विशेष इंतज़ाम किए, ताकि श्रद्धालुओं को दर्शन में कोई असुविधा न हो।
राष्ट्र प्रेस
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