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मद्रास हाईकोर्ट डीएमके विधायक मार्कंडेयन की रिमांड याचिका पर तत्काल सुनवाई को तैयार

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मद्रास हाईकोर्ट डीएमके विधायक मार्कंडेयन की रिमांड याचिका पर तत्काल सुनवाई को तैयार

सारांश

DMK विधायक जी.वी. मार्कंडेयन, जिन पर मुख्यमंत्री विजय को कथित धमकी देने का आरोप है, की न्यायिक रिमांड को मद्रास हाईकोर्ट में चुनौती दी गई है। न्यायमूर्ति इलंथिरैयन ने तत्काल सुनवाई स्वीकार की। विधायक 3 अगस्त तक हिरासत में हैं और BNSS प्रावधानों के उल्लंघन का तर्क दे रहे हैं।

मुख्य बातें

मद्रास उच्च न्यायालय ने 23 जुलाई को DMK विधायक जी.वी.
मार्कंडेयन की रिमांड याचिका पर तत्काल सुनवाई स्वीकार की।
विधायक को 20 जुलाई को गिरफ्तार किया गया और 3 अगस्त तक न्यायिक हिरासत में भेजा गया है।
आरोप है कि मार्कंडेयन ने 18 जुलाई की जनसभा में मुख्यमंत्री विजय को कथित तौर पर धमकी दी।
याचिका में BNSS की धारा 41ए के तहत नोटिस की बजाय सीधी गिरफ्तारी को अवैध बताया गया है।
विधायक ने अरनेश कुमार (2014) और सतेंद्र कुमार अंतिल (2022) के सर्वोच्च न्यायालय के फैसलों का हवाला दिया।
DCB ने BNS की धारा 351(3), 352 और 353(2) के तहत एफआईआर दर्ज की है।

मद्रास उच्च न्यायालय ने 23 जुलाई को विलाथिकुलम से द्रविड़ मुनेत्र कषगम (DMK) विधायक जी.वी. मार्कंडेयन की याचिका पर तत्काल सुनवाई की सहमति दे दी। यह याचिका मुख्यमंत्री विजय को कथित तौर पर धमकी देने वाले बयान के मामले में 20 जुलाई को पारित न्यायिक रिमांड आदेश को चुनौती देती है। विधायक 3 अगस्त तक न्यायिक हिरासत में हैं।

मुख्य घटनाक्रम

न्यायमूर्ति जी.के. इलंथिरैयन ने विधायक के अधिवक्ता की तत्काल हस्तक्षेप की अपील को स्वीकार करते हुए इसे लंच-मोशन के दौरान सुनवाई के लिए सूचीबद्ध किया। याचिका में तूतीकोरिन की न्यायिक मजिस्ट्रेट अदालत द्वारा पारित रिमांड आदेश को रद्द करने और मार्कंडेयन को जमानत पर रिहा करने की माँग की गई है।

गौरतलब है कि तूतीकोरिन जिला अपराध शाखा (DCB) ने एस. बालासुब्रमणियन की 19 जुलाई की शिकायत के आधार पर विधायक को गिरफ्तार किया था। शिकायत में आरोप लगाया गया था कि मार्कंडेयन ने 18 जुलाई को कोविलपट्टी स्थित कृष्णन मंदिर के पास आयोजित DMK की एक जनसभा में कहा था कि DMK विधायक विधानसभा के भीतर मुख्यमंत्री विजय की 'हड्डियाँ तोड़ देंगे'।

कानूनी आधार और विधायक की दलीलें

मार्कंडेयन ने अपनी याचिका में कहा है कि उनकी गिरफ्तारी भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) के तहत उपलब्ध कानूनी सुरक्षा प्रावधानों का उल्लंघन है। उनका तर्क है कि पुलिस ने यह स्पष्ट नहीं किया कि तत्काल गिरफ्तारी क्यों आवश्यक थी, जबकि BNSS की धारा 41ए के अंतर्गत नोटिस जारी कर पूछताछ की जा सकती थी।

याचिका में यह भी कहा गया है कि उन पर लगाए गए आरोपों में अधिकतम सात वर्ष की सजा का प्रावधान है। विधायक ने दलील दी कि ऐसे मामलों में केवल इसी आधार पर गिरफ्तारी उचित नहीं है।

मार्कंडेयन ने अपनी दलील के समर्थन में सर्वोच्च न्यायालय के दो महत्त्वपूर्ण फैसलों — अरनेश कुमार बनाम बिहार राज्य (2014) और सतेंद्र कुमार अंतिल बनाम CBI (2022) — का हवाला दिया। इन फैसलों में स्पष्ट किया गया है कि सात वर्ष तक की सजा वाले मामलों में, यदि कोई विशेष परिस्थिति न हो, तो पुलिस को गिरफ्तारी से पहले नोटिस जारी करना चाहिए।

एफआईआर और आरोप

DCB ने भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 351(3) (आपराधिक धमकी), 352 (शांति भंग करने के इरादे से जानबूझकर अपमान) और 353(2) (सार्वजनिक अशांति फैलाने वाले बयान) के तहत एफआईआर दर्ज की है। मजिस्ट्रेट ने विधायक को न्यायिक हिरासत में भेजते समय कथित भाषण की गंभीरता का उल्लेख करते हुए अरनेश कुमार मामले के दिशा-निर्देशों का भी संदर्भ दिया था।

राजनीतिक पृष्ठभूमि

यह मामला ऐसे समय में सामने आया है जब तमिलनाडु की राजनीति में सत्तारूढ़ DMK और विपक्षी दलों के बीच तनाव का माहौल है। मुख्यमंत्री विजय की कथित तौर पर धमकी देने का आरोप एक वरिष्ठ DMK विधायक पर लगना राजनीतिक दृष्टि से असामान्य है और इससे पार्टी की आंतरिक स्थिति पर भी सवाल उठ रहे हैं। अब सबकी निगाहें मद्रास उच्च न्यायालय की सुनवाई पर टिकी हैं, जहाँ विधायक की रिहाई या रिमांड का भविष्य तय होगा।

संपादकीय दृष्टिकोण

BNSS की धारा 41ए और सर्वोच्च न्यायालय के अरनेश कुमार दिशा-निर्देशों को लेकर जो तर्क उठाए गए हैं, वे पुलिस की गिरफ्तारी प्रक्रिया पर वास्तविक सवाल खड़े करते हैं — और यदि हाईकोर्ट इन्हें वैध मानता है, तो यह DCB की कार्यशैली पर भी टिप्पणी होगी। राजनीतिक रूप से, यह मामला DMK के भीतर उस असंतोष की एक झलक दे सकता है जो सार्वजनिक मंचों पर कभी-कभी फूट पड़ता है।
RashtraPress
23 जुलाई 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

डीएमके विधायक जी.वी. मार्कंडेयन को किस कारण गिरफ्तार किया गया?
मार्कंडेयन को 18 जुलाई की एक जनसभा में मुख्यमंत्री विजय को कथित तौर पर धमकी देने वाले बयान के आरोप में तूतीकोरिन DCB ने गिरफ्तार किया। शिकायत में आरोप है कि उन्होंने कहा कि DMK विधायक विधानसभा में मुख्यमंत्री की 'हड्डियाँ तोड़ देंगे'।
मद्रास हाईकोर्ट में दायर याचिका में क्या माँग की गई है?
याचिका में 20 जुलाई को तूतीकोरिन की मजिस्ट्रेट अदालत द्वारा पारित रिमांड आदेश को रद्द करने और विधायक को जमानत पर रिहा करने की माँग की गई है। साथ ही यह भी तर्क दिया गया है कि BNSS की धारा 41ए के तहत नोटिस जारी किया जाना चाहिए था।
BNSS की धारा 41ए क्या है और इसका इस मामले में क्या महत्त्व है?
BNSS की धारा 41ए पुलिस को उन मामलों में सीधी गिरफ्तारी की बजाय नोटिस जारी करने का निर्देश देती है, जहाँ तत्काल गिरफ्तारी आवश्यक न हो। मार्कंडेयन का तर्क है कि पुलिस ने इस प्रावधान का पालन किए बिना उन्हें हिरासत में ले लिया।
विधायक के खिलाफ कौन-सी धाराओं में मामला दर्ज है?
DCB ने BNS की धारा 351(3) (आपराधिक धमकी), 352 (शांति भंग के इरादे से अपमान) और 353(2) (सार्वजनिक अशांति फैलाने वाले बयान) के तहत एफआईआर दर्ज की है। इन धाराओं में अधिकतम सात वर्ष की सजा का प्रावधान है।
मार्कंडेयन ने किन सर्वोच्च न्यायालय के फैसलों का हवाला दिया है?
विधायक ने अरनेश कुमार बनाम बिहार राज्य (2014) और सतेंद्र कुमार अंतिल बनाम CBI (2022) के फैसलों का हवाला दिया, जिनमें सर्वोच्च न्यायालय ने कहा था कि सात वर्ष तक की सजा वाले मामलों में विशेष परिस्थिति के बिना पहले नोटिस जारी किया जाना चाहिए।
राष्ट्र प्रेस
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