PM मोदी ने एक्स पर शेयर किया गीता का श्लोक: 'जैसी श्रद्धा, वैसा ही बनता है मनुष्य का संपूर्ण व्यक्तित्व'
सारांश
मुख्य बातें
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने गुरुवार, 29 अक्टूबर 2026 की सुबह सोशल मीडिया प्लेटफ़ॉर्म एक्स पर एक संस्कृत सुभाषितम् साझा किया, जो श्रीमद्भगवद्गीता के अध्याय 17 (श्रद्धात्रयविभागयोग) के श्लोक 3 से लिया गया है। इस श्लोक का केंद्रीय भाव यह है कि मनुष्य की सोच, विश्वास और आचरण — सब कुछ उसकी श्रद्धा की प्रकृति से ही निर्धारित होता है। मोदी की यह पोस्ट उनकी नियमित 'संस्कृत सुभाषितम्' श्रृंखला का हिस्सा है, जिसके ज़रिए वे प्राचीन भारतीय ज्ञान को समकालीन संदर्भ में प्रस्तुत करते रहे हैं।
मोदी ने क्या लिखा
प्रधानमंत्री ने एक्स पर संस्कृत में लिखा: 'सत्त्वानुरूपा सर्वस्य श्रद्धा भवति भारत। श्रद्धामयोऽयं पुरुषो यो यच्छ्रद्धः स एव सः॥' इस श्लोक का भावार्थ है — 'हे भारत! प्रत्येक मनुष्य की श्रद्धा उसके अंतःकरण और स्वभाव के अनुरूप होती है। मनुष्य श्रद्धामय ही है — वह जैसी श्रद्धा रखता है, उसका संपूर्ण व्यक्तित्व भी वैसा ही बन जाता है।'
यह श्लोक महाभारत के उस प्रसंग से जुड़ा है जब अर्जुन ने श्रीकृष्ण से पूछा कि जो लोग शास्त्रोक्त विधि को छोड़कर केवल अपनी श्रद्धा से पूजा-आराधना करते हैं, उनकी निष्ठा सात्त्विकी, राजसी या तामसी — किस प्रकार की मानी जाए।
श्लोक का दार्शनिक संदर्भ
इस प्रश्न के उत्तर में श्रीकृष्ण समझाते हैं कि हमारी श्रद्धा की प्रकृति ही हमारे जीवन की दिशा तय करती है। श्रद्धा का गुण — सात्त्विक, राजसिक या तामसिक — हमारे मन की प्रकृति से उत्पन्न होता है। इस प्रकार अध्याय 17 में श्रीकृष्ण श्रद्धा के तीन विभागों की विस्तृत व्याख्या करते हैं, जो मनुष्य के भोजन, यज्ञ, तप और दान को भी प्रभावित करती है।
गौरतलब है कि यह श्लोक केवल धार्मिक नहीं, बल्कि मनोवैज्ञानिक दृष्टि से भी प्रासंगिक माना जाता है — यह इस विचार को रेखांकित करता है कि व्यक्ति की गहरी आस्था और विश्वास-प्रणाली ही उसके व्यवहार और निर्णयों को आकार देती है।
बुधवार का सुभाषितम्: प्रकृति-रक्षा पर संदेश
इससे एक दिन पहले, बुधवार 28 अक्टूबर को प्रधानमंत्री मोदी ने एक्स पर एक अन्य संस्कृत सुभाषितम् साझा किया था, जिसमें प्रकृति की रक्षा और उसके कल्याण के महत्व पर ज़ोर दिया गया था। उन्होंने लिखा: 'पालयन् प्रकृतिं राजा सुखी भवति नान्यथा। प्रकृतिश्च हिता यस्य स राजा सर्वकामधुक्॥'
इसका अर्थ है: 'जो राजा प्रकृति की रक्षा करता है और उसके कल्याण की दिशा में कार्य करता है, वह स्वयं सुखी होता है। और जो प्रकृति के हित में कार्य करता है, प्रकृति उसकी सभी इच्छाओं को पूर्ण करती है।' यह संदेश पर्यावरण-संरक्षण की प्राचीन भारतीय सोच को समकालीन नीति-चर्चा से जोड़ता है।
नियमित श्रृंखला का हिस्सा
प्रधानमंत्री मोदी पिछले कुछ समय से एक्स पर 'संस्कृत सुभाषितम्' की एक नियमित श्रृंखला साझा करते आ रहे हैं, जिसमें वे भारतीय शास्त्रों, उपनिषदों और महाकाव्यों से लिए गए श्लोकों को उनके अर्थ सहित प्रस्तुत करते हैं। आलोचकों का कहना है कि इन पोस्टों के ज़रिए सरकार सांस्कृतिक-राष्ट्रवाद की अपनी व्यापक राजनीतिक रणनीति को भी पोषित करती है; वहीं समर्थकों का तर्क है कि यह संस्कृत और प्राचीन ज्ञान के लोकप्रियकरण का एक सकारात्मक प्रयास है। आगे भी इस श्रृंखला के जारी रहने की संभावना है।