29 अक्टूबर 2026
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PM मोदी ने एक्स पर शेयर किया गीता का श्लोक: 'जैसी श्रद्धा, वैसा ही बनता है मनुष्य का संपूर्ण व्यक्तित्व'

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PM मोदी ने एक्स पर शेयर किया गीता का श्लोक: 'जैसी श्रद्धा, वैसा ही बनता है मनुष्य का संपूर्ण व्यक्तित्व'

सारांश

प्रधानमंत्री मोदी ने गुरुवार सुबह एक्स पर गीता का वह श्लोक साझा किया जो कहता है — 'मनुष्य जैसी श्रद्धा रखता है, उसका संपूर्ण व्यक्तित्व वैसा ही बन जाता है।' यह उनकी नियमित संस्कृत सुभाषितम् श्रृंखला का हिस्सा है, जो प्राचीन भारतीय ज्ञान को आज की पीढ़ी तक पहुँचाने का प्रयास है।

मुख्य बातें

PM नरेंद्र मोदी ने 29 अक्टूबर 2026 को एक्स पर भगवद्गीता अध्याय 17, श्लोक 3 साझा किया।
श्लोक का भाव: मनुष्य की श्रद्धा उसके स्वभाव के अनुरूप होती है और वह जैसी श्रद्धा रखता है, उसका संपूर्ण व्यक्तित्व वैसा ही बनता है।
यह श्लोक श्रद्धात्रयविभागयोग अध्याय से है, जिसमें श्रीकृष्ण ने अर्जुन के प्रश्न पर श्रद्धा के तीन प्रकारों (सात्त्विक, राजसिक, तामसिक) की व्याख्या की है।
एक दिन पहले 28 अक्टूबर को मोदी ने प्रकृति-रक्षा पर संस्कृत श्लोक साझा किया था।
यह मोदी की नियमित संस्कृत सुभाषितम् श्रृंखला का हिस्सा है।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने गुरुवार, 29 अक्टूबर 2026 की सुबह सोशल मीडिया प्लेटफ़ॉर्म एक्स पर एक संस्कृत सुभाषितम् साझा किया, जो श्रीमद्भगवद्गीता के अध्याय 17 (श्रद्धात्रयविभागयोग) के श्लोक 3 से लिया गया है। इस श्लोक का केंद्रीय भाव यह है कि मनुष्य की सोच, विश्वास और आचरण — सब कुछ उसकी श्रद्धा की प्रकृति से ही निर्धारित होता है। मोदी की यह पोस्ट उनकी नियमित 'संस्कृत सुभाषितम्' श्रृंखला का हिस्सा है, जिसके ज़रिए वे प्राचीन भारतीय ज्ञान को समकालीन संदर्भ में प्रस्तुत करते रहे हैं।

मोदी ने क्या लिखा

प्रधानमंत्री ने एक्स पर संस्कृत में लिखा: 'सत्त्वानुरूपा सर्वस्य श्रद्धा भवति भारत। श्रद्धामयोऽयं पुरुषो यो यच्छ्रद्धः स एव सः॥' इस श्लोक का भावार्थ है — 'हे भारत! प्रत्येक मनुष्य की श्रद्धा उसके अंतःकरण और स्वभाव के अनुरूप होती है। मनुष्य श्रद्धामय ही है — वह जैसी श्रद्धा रखता है, उसका संपूर्ण व्यक्तित्व भी वैसा ही बन जाता है।'

यह श्लोक महाभारत के उस प्रसंग से जुड़ा है जब अर्जुन ने श्रीकृष्ण से पूछा कि जो लोग शास्त्रोक्त विधि को छोड़कर केवल अपनी श्रद्धा से पूजा-आराधना करते हैं, उनकी निष्ठा सात्त्विकी, राजसी या तामसी — किस प्रकार की मानी जाए।

श्लोक का दार्शनिक संदर्भ

इस प्रश्न के उत्तर में श्रीकृष्ण समझाते हैं कि हमारी श्रद्धा की प्रकृति ही हमारे जीवन की दिशा तय करती है। श्रद्धा का गुण — सात्त्विक, राजसिक या तामसिक — हमारे मन की प्रकृति से उत्पन्न होता है। इस प्रकार अध्याय 17 में श्रीकृष्ण श्रद्धा के तीन विभागों की विस्तृत व्याख्या करते हैं, जो मनुष्य के भोजन, यज्ञ, तप और दान को भी प्रभावित करती है।

गौरतलब है कि यह श्लोक केवल धार्मिक नहीं, बल्कि मनोवैज्ञानिक दृष्टि से भी प्रासंगिक माना जाता है — यह इस विचार को रेखांकित करता है कि व्यक्ति की गहरी आस्था और विश्वास-प्रणाली ही उसके व्यवहार और निर्णयों को आकार देती है।

बुधवार का सुभाषितम्: प्रकृति-रक्षा पर संदेश

इससे एक दिन पहले, बुधवार 28 अक्टूबर को प्रधानमंत्री मोदी ने एक्स पर एक अन्य संस्कृत सुभाषितम् साझा किया था, जिसमें प्रकृति की रक्षा और उसके कल्याण के महत्व पर ज़ोर दिया गया था। उन्होंने लिखा: 'पालयन् प्रकृतिं राजा सुखी भवति नान्यथा। प्रकृतिश्च हिता यस्य स राजा सर्वकामधुक्॥'

इसका अर्थ है: 'जो राजा प्रकृति की रक्षा करता है और उसके कल्याण की दिशा में कार्य करता है, वह स्वयं सुखी होता है। और जो प्रकृति के हित में कार्य करता है, प्रकृति उसकी सभी इच्छाओं को पूर्ण करती है।' यह संदेश पर्यावरण-संरक्षण की प्राचीन भारतीय सोच को समकालीन नीति-चर्चा से जोड़ता है।

नियमित श्रृंखला का हिस्सा

प्रधानमंत्री मोदी पिछले कुछ समय से एक्स पर 'संस्कृत सुभाषितम्' की एक नियमित श्रृंखला साझा करते आ रहे हैं, जिसमें वे भारतीय शास्त्रों, उपनिषदों और महाकाव्यों से लिए गए श्लोकों को उनके अर्थ सहित प्रस्तुत करते हैं। आलोचकों का कहना है कि इन पोस्टों के ज़रिए सरकार सांस्कृतिक-राष्ट्रवाद की अपनी व्यापक राजनीतिक रणनीति को भी पोषित करती है; वहीं समर्थकों का तर्क है कि यह संस्कृत और प्राचीन ज्ञान के लोकप्रियकरण का एक सकारात्मक प्रयास है। आगे भी इस श्रृंखला के जारी रहने की संभावना है।

संपादकीय दृष्टिकोण

सीधे भावनात्मक और आध्यात्मिक स्तर पर मतदाताओं को जोड़ती है। यह रणनीति जितनी धार्मिक है, उतनी ही राजनीतिक भी है — शास्त्रीय ज्ञान की आड़ में एक सांस्कृतिक राष्ट्रवाद का सूक्ष्म संप्रेषण। मुख्यधारा की मीडिया इन पोस्टों को 'आध्यात्मिक सामग्री' कहकर उनके राजनीतिक आयाम को नज़रअंदाज़ कर देती है, जबकि इनका संचयी प्रभाव एक ऐसी छवि गढ़ता है जो मोदी को धर्म और राष्ट्र के अभिभावक के रूप में स्थापित करती है।
RashtraPress
29 अक्टूबर 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

PM मोदी ने गीता का कौन-सा श्लोक शेयर किया और उसका अर्थ क्या है?
मोदी ने भगवद्गीता के अध्याय 17 (श्रद्धात्रयविभागयोग), श्लोक 3 को साझा किया। इसका अर्थ है कि प्रत्येक मनुष्य की श्रद्धा उसके अंतःकरण और स्वभाव के अनुरूप होती है, और वह जैसी श्रद्धा रखता है, उसका संपूर्ण व्यक्तित्व भी वैसा ही बन जाता है।
भगवद्गीता का अध्याय 17 किस विषय पर है?
अध्याय 17 को 'श्रद्धात्रयविभागयोग' कहा जाता है, जिसमें श्रीकृष्ण श्रद्धा के तीन प्रकारों — सात्त्विक, राजसिक और तामसिक — की व्याख्या करते हैं। यह अर्जुन के उस प्रश्न के उत्तर में है कि जो लोग शास्त्र-विधि छोड़कर श्रद्धा से पूजा करते हैं, उनकी निष्ठा किस श्रेणी में आती है।
मोदी ने एक्स पर बुधवार को कौन-सा श्लोक साझा किया था?
28 अक्टूबर को मोदी ने प्रकृति-रक्षा पर एक श्लोक साझा किया था — 'पालयन् प्रकृतिं राजा सुखी भवति नान्यथा।' इसका अर्थ है कि जो राजा प्रकृति की रक्षा करता है, वह सुखी रहता है और प्रकृति उसकी सभी इच्छाएं पूरी करती है।
PM मोदी की संस्कृत सुभाषितम् श्रृंखला क्या है?
यह एक नियमित सोशल मीडिया श्रृंखला है जिसमें प्रधानमंत्री मोदी भारतीय शास्त्रों, उपनिषदों और महाकाव्यों से लिए गए संस्कृत श्लोकों को उनके हिंदी अर्थ सहित एक्स पर साझा करते हैं। इसका उद्देश्य प्राचीन भारतीय ज्ञान को आम जनमानस तक पहुँचाना बताया जाता है।
गीता के इस श्लोक में 'भारत' शब्द किसके लिए प्रयुक्त है?
इस श्लोक में 'भारत' शब्द अर्जुन को संबोधित करने के लिए प्रयुक्त है, क्योंकि अर्जुन भरत वंश के वंशज थे। यह महाभारत की संवाद-शैली में एक सामान्य संबोधन है।
राष्ट्र प्रेस
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