मध्य प्रदेश में यूसीसी विधेयक पारित: भाजपा ने कहा 'ऐतिहासिक', कांग्रेस ने बताया 'ध्यान भटकाने की कोशिश'
सारांश
मुख्य बातें
मध्य प्रदेश विधानसभा के मानसून सत्र के दूसरे दिन मंगलवार, 21 जुलाई को समान नागरिक संहिता (यूसीसी) विधेयक पारित होते ही सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) और विपक्षी भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस (कांग्रेस) के बीच तीखी राजनीतिक बहस छिड़ गई। सत्ता पक्ष ने इसे सामाजिक न्याय की दिशा में ऐतिहासिक कदम बताया, जबकि विपक्ष ने इसे असली मुद्दों से ध्यान भटकाने की रणनीति करार दिया।
भाजपा की प्रतिक्रिया: 'इतिहास रच दिया'
राज्य भाजपा अध्यक्ष एवं विधायक हेमंत खंडेलवाल ने विधेयक पारित होने के बाद मुख्यमंत्री मोहन यादव को बधाई देते हुए कहा कि उनकी सरकार ने यूसीसी लागू कर मध्य प्रदेश में इतिहास रच दिया है। उन्होंने कहा कि यह कानून सामाजिक न्याय, समानता और संवैधानिक मूल्यों को मज़बूत करेगा तथा महिलाओं के लिए अधिक सुरक्षा और समान अधिकार सुनिश्चित करेगा।
खंडेलवाल ने यह भी स्पष्ट किया कि नए कानून के तहत लिव-इन रिलेशनशिप का अनिवार्य पंजीकरण एक महीने के भीतर करना होगा और उल्लंघन पर दंडात्मक प्रावधान लागू होंगे। उन्होंने ज़ोर देकर कहा कि आदिवासी समुदाय को इस कानून के दायरे से बाहर रखा गया है और उनके रीति-रिवाज तथा परंपराएँ पूरी तरह अप्रभावित रहेंगी।
कांग्रेस का विरोध: 'असली मुद्दों से भटकाव'
विधानसभा परिसर में प्रतीकात्मक विरोध प्रदर्शन का नेतृत्व करने वाले विपक्ष के नेता उमंग सिंघर ने सरकार पर किसानों की दुर्दशा, बेरोज़गारी, महिलाओं के विरुद्ध अपराध, शिक्षा और स्वास्थ्य सेवा की अनदेखी करने का आरोप लगाया।
सिंघर ने कहा, 'भाजपा सरकार जनता की वास्तविक समस्याओं पर ध्यान नहीं दे रही है। किसानों, बेरोज़गार युवाओं, महंगाई, शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाओं पर चर्चा करने के बजाय वह यूसीसी जैसे मुद्दों को उठाकर ध्यान भटकाने की कोशिश कर रही है।' उन्होंने आरोप लगाया कि सरकार ने राज्य की चुनौतियों से ध्यान हटाने के लिए जल्दबाज़ी में यह विधेयक पारित कराया।
विधेयक की मुख्य विशेषताएँ
यूसीसी विधेयक का उद्देश्य विभिन्न धर्मों के व्यक्तिगत कानूनों — जैसे विवाह, तलाक, उत्तराधिकार और गोद लेने से जुड़े नियमों — को एकसमान कानूनी ढाँचे में समाहित करना है। गौरतलब है कि उत्तराखंड के बाद मध्य प्रदेश यूसीसी पारित करने वाला देश का दूसरा राज्य बन गया है। यह ऐसे समय में आया है जब केंद्र स्तर पर भी यूसीसी को लेकर बहस जारी है।
आदिवासी समुदाय को कानून के दायरे से बाहर रखने का प्रावधान राजनीतिक दृष्टि से महत्त्वपूर्ण है, क्योंकि मध्य प्रदेश में आदिवासी आबादी राज्य की कुल जनसंख्या का बड़ा हिस्सा है।
विधानसभा में माहौल
मानसून सत्र के दूसरे दिन की कार्यवाही में यूसीसी विधेयक केंद्रबिंदु रहा। सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच तीखी बहस के बाद विधेयक को पारित किया गया। कांग्रेस विधायकों ने विधानसभा परिसर में प्रतीकात्मक विरोध प्रदर्शन किया, जिससे दोनों दलों के बीच राजनीतिक टकराव और गहरा हो गया।
आगे क्या होगा
विधेयक पारित होने के बाद इसे राज्यपाल की मंज़ूरी के लिए भेजा जाएगा। कानून के क्रियान्वयन के लिए नियम और विनियम तैयार किए जाएँगे। विशेषज्ञों का मानना है कि यह कानून न्यायालयों में चुनौती का सामना कर सकता है, विशेष रूप से धार्मिक स्वतंत्रता और आदिवासी अधिकारों के संदर्भ में।