ओपी राजभर का अखिलेश पर हमला: सपा को बताया 'यादववादी पार्टी', बहुजन सम्मान की लड़ाई जारी रहेगी
सारांश
मुख्य बातें
उत्तर प्रदेश के कैबिनेट मंत्री और सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी (सुभासपा) के अध्यक्ष ओम प्रकाश राजभर ने 4 जुलाई को समाजवादी पार्टी (सपा) के अध्यक्ष अखिलेश यादव पर तीखा प्रहार करते हुए सपा को 'वाईपी' यानी 'यादववादी पार्टी' करार दिया। राजभर ने आरोप लगाया कि सपा के शासन और संगठन में बहुजन एवं अति पिछड़ी जातियों के साथ वर्षों से भेदभाव और उत्पीड़न होता रहा है।
एक्स पर पोस्ट से छिड़ी सियासी बहस
राजभर ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर एक पोस्ट के ज़रिए अखिलेश यादव और उनके चाचा शिवपाल सिंह यादव पर एक साथ निशाना साधा। उन्होंने लिखा कि शिवपाल यादव वही भाषा बोल रहे हैं जो अखिलेश की 'यादवनीति' की घुट्टी से आई है। साथ ही उन्होंने कहा कि सार्वजनिक जीवन में गाली-गलौच की भाषा उचित नहीं है और शिवपाल की उम्र को देखते हुए अखिलेश को उन्हें भजन सिखाना चाहिए।
बहुजन जातियों के उत्पीड़न का आरोप
राजभर ने अपनी पोस्ट में पाल, प्रजापति, बिंद, केवट, मल्लाह, राजभर, निषाद, मांझी, दर्जी, तेली, लोनिया, फकीर और बंजारा जैसी जातियों का उल्लेख करते हुए आरोप लगाया कि सपा कार्यकर्ताओं द्वारा इन समुदायों के साथ पीढ़ियों से अपमानजनक व्यवहार होता आया है। उन्होंने कहा कि अवध और पूर्वांचल में आज भी इन जातियों को हाशिये पर रखा जाता है।
मेरठ और पूर्व मंत्री प्रभु दयाल वाल्मीकि का ज़िक्र
मंत्री राजभर ने मेरठ में दलित-पिछड़ों के कथित अपमान और पूर्व मंत्री प्रभु दयाल वाल्मीकि तथा सपा के एक अति पिछड़ी जाति के जिलाध्यक्ष के साथ हुए व्यवहार का हवाला देते हुए कहा कि वे हमेशा इन वर्गों की आवाज़ उठाते रहेंगे। उन्होंने स्पष्ट किया कि इसके लिए चाहे जितनी आलोचना सहनी पड़े, वे पीछे नहीं हटेंगे।
'पीडीए' की परिभाषा पर विवाद
राजभर ने 'पीडीए' (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) की अखिलेश यादव की अवधारणा पर भी तंज कसा। उनका कहना था कि गाँवों की ज़मीनी हकीकत में यह 'पीडीए' दरअसल 'पीट देगा अहीर' बनकर रह गया है — जो बहुजन समुदायों के लिए एक कड़वी सच्चाई है।
आगे क्या
यह बयानबाज़ी उत्तर प्रदेश में 2027 विधानसभा चुनाव से पहले पिछड़ा-दलित वोट बैंक को लेकर तेज़ होती राजनीतिक प्रतिस्पर्धा की पृष्ठभूमि में आई है। राजभर के इस हमले के बाद सपा की ओर से अभी तक कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है। राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार, यह विवाद भाजपा गठबंधन और सपा दोनों के लिए अति पिछड़ी जातियों को साधने की रणनीतिक लड़ाई का हिस्सा है।