4 जुलाई 2026
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ओपी राजभर का अखिलेश पर हमला: सपा को बताया 'यादववादी पार्टी', बहुजन सम्मान की लड़ाई जारी रहेगी

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ओपी राजभर का अखिलेश पर हमला: सपा को बताया 'यादववादी पार्टी', बहुजन सम्मान की लड़ाई जारी रहेगी

सारांश

ओपी राजभर ने सपा को सीधे 'यादववादी पार्टी' कहकर उत्तर प्रदेश की जातीय राजनीति में नई आग लगा दी। 2027 से पहले बहुजन वोट बैंक पर यह दावेदारी — गाली खाने की चुनौती के साथ — बताती है कि पिछड़ा-दलित एजेंडे पर असली लड़ाई अभी शुरू हुई है।

मुख्य बातें

ओम प्रकाश राजभर ने 4 जुलाई को एक्स पर पोस्ट कर सपा को 'यादववादी पार्टी' करार दिया।
राजभर ने आरोप लगाया कि सपा शासन में पाल, प्रजापति, राजभर, निषाद सहित 13 से अधिक बहुजन जातियों के साथ भेदभाव हुआ।
शिवपाल सिंह यादव की भाषा पर भी कटाक्ष किया; कहा — उम्र हो गई है, गाली-गलौच ठीक नहीं।
मेरठ में दलित-पिछड़ों के कथित अपमान और पूर्व मंत्री प्रभु दयाल वाल्मीकि के मामले का हवाला दिया।
राजभर ने कहा — गाली और लाठी खाएंगे, लेकिन बहुजन सम्मान की आवाज़ बंद नहीं होगी।

उत्तर प्रदेश के कैबिनेट मंत्री और सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी (सुभासपा) के अध्यक्ष ओम प्रकाश राजभर ने 4 जुलाई को समाजवादी पार्टी (सपा) के अध्यक्ष अखिलेश यादव पर तीखा प्रहार करते हुए सपा को 'वाईपी' यानी 'यादववादी पार्टी' करार दिया। राजभर ने आरोप लगाया कि सपा के शासन और संगठन में बहुजन एवं अति पिछड़ी जातियों के साथ वर्षों से भेदभाव और उत्पीड़न होता रहा है।

एक्स पर पोस्ट से छिड़ी सियासी बहस

राजभर ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर एक पोस्ट के ज़रिए अखिलेश यादव और उनके चाचा शिवपाल सिंह यादव पर एक साथ निशाना साधा। उन्होंने लिखा कि शिवपाल यादव वही भाषा बोल रहे हैं जो अखिलेश की 'यादवनीति' की घुट्टी से आई है। साथ ही उन्होंने कहा कि सार्वजनिक जीवन में गाली-गलौच की भाषा उचित नहीं है और शिवपाल की उम्र को देखते हुए अखिलेश को उन्हें भजन सिखाना चाहिए।

बहुजन जातियों के उत्पीड़न का आरोप

राजभर ने अपनी पोस्ट में पाल, प्रजापति, बिंद, केवट, मल्लाह, राजभर, निषाद, मांझी, दर्जी, तेली, लोनिया, फकीर और बंजारा जैसी जातियों का उल्लेख करते हुए आरोप लगाया कि सपा कार्यकर्ताओं द्वारा इन समुदायों के साथ पीढ़ियों से अपमानजनक व्यवहार होता आया है। उन्होंने कहा कि अवध और पूर्वांचल में आज भी इन जातियों को हाशिये पर रखा जाता है।

मेरठ और पूर्व मंत्री प्रभु दयाल वाल्मीकि का ज़िक्र

मंत्री राजभर ने मेरठ में दलित-पिछड़ों के कथित अपमान और पूर्व मंत्री प्रभु दयाल वाल्मीकि तथा सपा के एक अति पिछड़ी जाति के जिलाध्यक्ष के साथ हुए व्यवहार का हवाला देते हुए कहा कि वे हमेशा इन वर्गों की आवाज़ उठाते रहेंगे। उन्होंने स्पष्ट किया कि इसके लिए चाहे जितनी आलोचना सहनी पड़े, वे पीछे नहीं हटेंगे।

'पीडीए' की परिभाषा पर विवाद

राजभर ने 'पीडीए' (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) की अखिलेश यादव की अवधारणा पर भी तंज कसा। उनका कहना था कि गाँवों की ज़मीनी हकीकत में यह 'पीडीए' दरअसल 'पीट देगा अहीर' बनकर रह गया है — जो बहुजन समुदायों के लिए एक कड़वी सच्चाई है।

आगे क्या

यह बयानबाज़ी उत्तर प्रदेश में 2027 विधानसभा चुनाव से पहले पिछड़ा-दलित वोट बैंक को लेकर तेज़ होती राजनीतिक प्रतिस्पर्धा की पृष्ठभूमि में आई है। राजभर के इस हमले के बाद सपा की ओर से अभी तक कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है। राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार, यह विवाद भाजपा गठबंधन और सपा दोनों के लिए अति पिछड़ी जातियों को साधने की रणनीतिक लड़ाई का हिस्सा है।

संपादकीय दृष्टिकोण

बल्कि 2027 विधानसभा चुनाव से पहले अति पिछड़ी जातियों पर दावेदारी की सुनियोजित रणनीति है। दिलचस्प यह है कि भाजपा गठबंधन में रहते हुए राजभर सपा पर हमला करते हैं, लेकिन खुद उनकी सरकार में इन्हीं जातियों की ज़मीनी स्थिति पर कोई ठोस डेटा सामने नहीं आता। 'पीडीए बनाम यादववादी पार्टी' की यह शब्द-लड़ाई असल में उस वोट बैंक को लेकर है जो 2022 में सपा की ओर झुका था। मुख्यधारा की कवरेज बयानों की तीखास पर अटकी है — असली सवाल यह है कि दोनों पक्षों में से किसने इन जातियों के लिए नीतिगत स्तर पर क्या किया।
RashtraPress
4 जुलाई 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

ओपी राजभर ने सपा को 'यादववादी पार्टी' क्यों कहा?
राजभर ने आरोप लगाया कि सपा के संगठन और शासन में बहुजन व अति पिछड़ी जातियों के साथ भेदभाव होता रहा है, इसलिए उन्होंने सपा को 'वाईपी' यानी 'यादववादी पार्टी' कहा। उनका तर्क है कि पार्टी का लाभ केवल यादव समुदाय को मिलता है।
राजभर ने शिवपाल सिंह यादव पर क्या टिप्पणी की?
राजभर ने कहा कि शिवपाल यादव अखिलेश की 'यादवनीति' की घुट्टी से प्रभावित होकर वही भाषा बोल रहे हैं। उन्होंने अखिलेश से अपील की कि वे अपने चाचा को गाली-गलौच छोड़कर भजन सिखाएं, क्योंकि यह उम्र और सार्वजनिक जीवन के लिए उचित नहीं है।
'पीडीए' को लेकर राजभर का क्या कहना है?
राजभर ने अखिलेश के 'पीडीए' (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) नारे पर तंज कसते हुए कहा कि गाँवों में यह 'पीट देगा अहीर' बनकर रह गया है। उनके अनुसार, अवध और पूर्वांचल में बहुजन जातियों को आज भी अपमान झेलना पड़ता है।
इस विवाद में कौन-कौन सी जातियों का ज़िक्र किया गया?
राजभर ने पाल, प्रजापति, बिंद, केवट, मल्लाह, राजभर, निषाद, मांझी, दर्जी, तेली, लोनिया, फकीर और बंजारा जातियों का उल्लेख किया। उनका कहना था कि इन सभी समुदायों के साथ सपा कार्यकर्ताओं द्वारा पीढ़ियों से भेदभाव होता आया है।
यह विवाद उत्तर प्रदेश की राजनीति के लिए क्यों महत्वपूर्ण है?
2027 के विधानसभा चुनाव से पहले अति पिछड़ी जातियों का वोट बैंक निर्णायक माना जाता है। राजभर का यह हमला भाजपा गठबंधन और सपा के बीच इन जातियों को साधने की रणनीतिक प्रतिस्पर्धा को दर्शाता है।
राष्ट्र प्रेस
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