30 अक्टूबर 2026
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सुप्रीम कोर्ट का आदेश: अदालती रिकॉर्डिंग के अनधिकृत उपयोग पर कार्रवाई नीति में शामिल हो

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सुप्रीम कोर्ट का आदेश: अदालती रिकॉर्डिंग के अनधिकृत उपयोग पर कार्रवाई नीति में शामिल हो

सारांश

सर्वोच्च न्यायालय ने डिजिटल युग की एक बड़ी चुनौती से सीधे टकराते हुए केंद्र को आदेश दिया है कि अदालती कार्यवाही की रिकॉर्डिंग के दुरुपयोग पर दंडात्मक कार्रवाई का प्रावधान नई नीति में अनिवार्य हो। पारदर्शिता और दुरुपयोग रोकथाम का यह संतुलन भारतीय न्यायिक प्रणाली की डिजिटल रूपरेखा तय करेगा।

मुख्य बातें

सर्वोच्च न्यायालय ने 30 अक्टूबर 2026 को MeitY को निर्देश दिया कि अदालती रिकॉर्डिंग के अनधिकृत उपयोग पर कार्रवाई का प्रावधान नीतिगत ढाँचे में शामिल किया जाए।
CJI सूर्यकांत , न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति वी.
मोहना की पीठ ने यह आदेश पारित किया।
सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने बताया कि उच्च न्यायालयों और विधि समुदाय से प्राप्त सुझाव सुप्रीम कोर्ट रजिस्ट्री को भेजे जा चुके हैं।
अदालत ने जुलाई 2026 में जारी अंतरिम प्रतिबंधों — अनुमति के बिना रिकॉर्डिंग का प्रसार, मुद्रीकरण, अपलोड आदि — के उल्लंघनों की जानकारी मिलने पर यह कदम उठाया।
डिजिटल वॉटरमार्किंग और प्रमाणित रिकॉर्डिंग जैसे तकनीकी उपायों पर भी सुनवाई हुई।
मान्यता प्राप्त समाचार माध्यम अदालती घटनाक्रम की रिपोर्टिंग जारी रख सकते हैं, लेकिन ऑडियो-वीडियो क्लिप का सीधा उपयोग नहीं कर सकते।

सर्वोच्च न्यायालय ने 30 अक्टूबर 2026 को केंद्र सरकार को स्पष्ट निर्देश दिया कि न्यायिक कार्यवाही की ऑडियो-वीडियो रिकॉर्डिंग के अनधिकृत उपयोग और व्यावसायिक शोषण पर पहले से लागू अंतरिम प्रतिबंधों का उल्लंघन करने वालों के विरुद्ध कार्रवाई के प्रावधान प्रस्तावित नीतिगत ढाँचे में अनिवार्य रूप से जोड़े जाएँ। यह निर्देश ऐसे समय आया है जब केंद्र सरकार उच्च न्यायालयों और विधि समुदाय से प्राप्त सुझावों के आधार पर एक व्यापक नियामक नीति तैयार कर रही है।

पीठ की संरचना और निर्देश

भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना की पीठ ने इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय (MeitY) को इस वर्ष जुलाई में जारी अंतरिम निर्देशों का कड़ाई से अनुपालन सुनिश्चित करने का आदेश दिया। पीठ ने आदेश में स्पष्ट किया कि जो भी व्यक्ति या संस्था इन निर्देशों का पालन नहीं करती, उनके विरुद्ध उचित दंडात्मक कार्रवाई का प्रावधान नीतिगत ढाँचे का अभिन्न हिस्सा होगा।

सॉलिसिटर जनरल की अदालत में जानकारी

सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने पीठ को सूचित किया कि केंद्र सरकार न्यायिक कार्यवाही की रिकॉर्डिंग के उपयोग को विनियमित करने हेतु विभिन्न उच्च न्यायालयों और विधि समुदाय के सदस्यों से सुझाव एकत्र कर रही है। उन्होंने बताया कि ये सुझाव सुप्रीम कोर्ट रजिस्ट्री को भेज दिए गए हैं और इन्हें समाहित करते हुए एक ढाँचा तैयार किया जाएगा, जिसे सर्वोच्च न्यायालय के विचारार्थ प्रस्तुत किया जाएगा।

मेहता ने यह भी बताया कि पूर्व अंतरिम निर्देशों के उल्लंघन के कुछ मामले प्रकाश में आए हैं, और सुझाव दिया कि ऐसी सामग्री जो प्रतिबंधों का उल्लंघन करते हुए अपलोड की गई है, उसे तत्काल हटाया जाना चाहिए।

अंतरिम प्रतिबंधों की पृष्ठभूमि

गौरतलब है कि सर्वोच्च न्यायालय ने इससे पहले अदालती कार्यवाही की ऑडियो-वीडियो रिकॉर्डिंग को सोशल मीडिया या अन्य डिजिटल प्लेटफॉर्म पर सुप्रीम कोर्ट के महासचिव या संबंधित उच्च न्यायालयों के रजिस्ट्रार जनरल की पूर्व अनुमति के बिना निकालने, प्रसारित करने, मुद्रीकरण करने, पोस्ट करने, पुनः पोस्ट करने, अपलोड करने, प्रसारित करने, संशोधित करने, संग्रहीत करने या होस्ट करने पर पूर्ण अंतरिम प्रतिबंध लगाए थे। न्यायालय ने स्पष्ट किया था कि ये प्रतिबंध मान्यता प्राप्त समाचार माध्यमों की रिपोर्टिंग को बाधित नहीं करेंगे, हालाँकि वे अपनी कवरेज में अदालती कार्यवाही के ऑडियो या वीडियो क्लिप सीधे उपयोग नहीं कर सकते।

तकनीकी उपायों पर विचार-विमर्श

शुक्रवार की सुनवाई के दौरान, सर्वोच्च न्यायालय ने डिजिटल वॉटरमार्किंग, प्रमाणित रिकॉर्डिंग और लाइव-स्ट्रीम की गई न्यायिक कार्यवाही के अनुमत उपयोग से संबंधित दलीलें भी सुनीं। ये उपाय इस बात की निगरानी के लिए महत्वपूर्ण माने जा रहे हैं कि कौन-सी सामग्री किसने और किस उद्देश्य से साझा की।

इस मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने पहले ही सभी उच्च न्यायालयों और प्रमुख सोशल मीडिया मध्यस्थों व प्रौद्योगिकी प्लेटफॉर्म को पक्षकार बनाया है, और उनसे लाइव स्ट्रीमिंग तथा रिकॉर्डिंग के लिए आदर्श नियमों पर सुझाव माँगे हैं।

आगे क्या होगा

केंद्र सरकार को सभी उच्च न्यायालयों और विधि विशेषज्ञों के सुझाव समाहित कर एक समग्र नीतिगत ढाँचा सर्वोच्च न्यायालय के सामने रखना है। अदालत ने यह भी सुनिश्चित करने का निर्देश दिया था कि याचिका में माँगी गई राहतों को लागू करने के लिए जिम्मेदार नोडल मंत्रालयों की पहचान की जाए। यह मामला न्यायिक पारदर्शिता और डिजिटल युग में अदालती कार्यवाही के दुरुपयोग की रोकथाम के बीच संतुलन बनाने की दिशा में एक निर्णायक कदम साबित हो सकता है।

संपादकीय दृष्टिकोण

लेकिन असली कसौटी क्रियान्वयन की होगी — डिजिटल प्लेटफॉर्म पर वायरल होने वाली अदालती क्लिप को हटाने के लिए जिस गति और समन्वय की जरूरत है, वह भारत के नियामक ढाँचे में अभी तक दुर्लभ रही है। मुख्यधारा की कवरेज जो चूक जाती है वह यह है कि यह मामला केवल 'कॉपीराइट' या 'अनुमति' का नहीं है — यह इस बात का भी है कि संदर्भ से काटी गई अदालती क्लिप न्यायिक प्रक्रिया की सार्वजनिक समझ को कितनी गहराई से विकृत कर सकती है। MeitY और बड़े प्रौद्योगिकी प्लेटफॉर्म के बीच अनुपालन की जवाबदेही तय किए बिना यह नीति एक और अच्छे इरादे वाले दस्तावेज़ तक सिमट सकती है।
RashtraPress
30 अक्टूबर 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

सुप्रीम कोर्ट ने अदालती रिकॉर्डिंग पर क्या नया आदेश दिया है?
सर्वोच्च न्यायालय ने 30 अक्टूबर 2026 को MeitY को निर्देश दिया है कि न्यायिक कार्यवाही की ऑडियो-वीडियो रिकॉर्डिंग के अनधिकृत उपयोग पर लगे अंतरिम प्रतिबंधों का उल्लंघन करने वालों के विरुद्ध कार्रवाई के प्रावधान प्रस्तावित नीतिगत ढाँचे में शामिल किए जाएँ। यह आदेश CJI सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली तीन सदस्यीय पीठ ने पारित किया।
अदालती रिकॉर्डिंग पर अंतरिम प्रतिबंध पहले कब लगाए गए थे?
सर्वोच्च न्यायालय ने इस वर्ष जुलाई 2026 में अंतरिम निर्देश जारी किए थे, जिनके तहत अदालती कार्यवाही की रिकॉर्डिंग को सुप्रीम कोर्ट के महासचिव या संबंधित उच्च न्यायालय के रजिस्ट्रार जनरल की पूर्व अनुमति के बिना सोशल मीडिया या किसी डिजिटल प्लेटफॉर्म पर प्रसारित, अपलोड, मुद्रीकृत या संशोधित करना प्रतिबंधित है।
क्या मीडिया संस्थान अदालती कार्यवाही की रिपोर्टिंग कर सकते हैं?
हाँ, मान्यता प्राप्त समाचार माध्यम न्यायिक घटनाक्रमों की रिपोर्टिंग जारी रख सकते हैं। हालाँकि, वे अपनी कवरेज में अदालती कार्यवाही के ऑडियो या वीडियो क्लिप का सीधा उपयोग नहीं कर सकते — यह स्पष्टीकरण सर्वोच्च न्यायालय ने अंतरिम निर्देशों के बाद दिया था।
नीतिगत ढाँचे में कौन-से तकनीकी उपायों पर विचार हो रहा है?
30 अक्टूबर की सुनवाई के दौरान डिजिटल वॉटरमार्किंग, प्रमाणित रिकॉर्डिंग और लाइव-स्ट्रीम की गई न्यायिक कार्यवाही के अनुमत उपयोग पर दलीलें सुनी गईं। ये उपाय यह सुनिश्चित करने के लिए प्रस्तावित हैं कि रिकॉर्डिंग की उत्पत्ति और उपयोग को ट्रैक किया जा सके।
आगे इस मामले में क्या होगा?
केंद्र सरकार उच्च न्यायालयों और विधि समुदाय से प्राप्त सुझावों को समाहित करते हुए एक नीतिगत ढाँचा तैयार कर सर्वोच्च न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत करेगी। साथ ही, अंतरिम प्रतिबंधों का उल्लंघन करते हुए अपलोड की गई सामग्री को हटाने की कार्रवाई भी की जाएगी।
राष्ट्र प्रेस
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