सुप्रीम कोर्ट का आदेश: अदालती रिकॉर्डिंग के अनधिकृत उपयोग पर कार्रवाई नीति में शामिल हो
सारांश
मुख्य बातें
सर्वोच्च न्यायालय ने 30 अक्टूबर 2026 को केंद्र सरकार को स्पष्ट निर्देश दिया कि न्यायिक कार्यवाही की ऑडियो-वीडियो रिकॉर्डिंग के अनधिकृत उपयोग और व्यावसायिक शोषण पर पहले से लागू अंतरिम प्रतिबंधों का उल्लंघन करने वालों के विरुद्ध कार्रवाई के प्रावधान प्रस्तावित नीतिगत ढाँचे में अनिवार्य रूप से जोड़े जाएँ। यह निर्देश ऐसे समय आया है जब केंद्र सरकार उच्च न्यायालयों और विधि समुदाय से प्राप्त सुझावों के आधार पर एक व्यापक नियामक नीति तैयार कर रही है।
पीठ की संरचना और निर्देश
भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना की पीठ ने इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय (MeitY) को इस वर्ष जुलाई में जारी अंतरिम निर्देशों का कड़ाई से अनुपालन सुनिश्चित करने का आदेश दिया। पीठ ने आदेश में स्पष्ट किया कि जो भी व्यक्ति या संस्था इन निर्देशों का पालन नहीं करती, उनके विरुद्ध उचित दंडात्मक कार्रवाई का प्रावधान नीतिगत ढाँचे का अभिन्न हिस्सा होगा।
सॉलिसिटर जनरल की अदालत में जानकारी
सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने पीठ को सूचित किया कि केंद्र सरकार न्यायिक कार्यवाही की रिकॉर्डिंग के उपयोग को विनियमित करने हेतु विभिन्न उच्च न्यायालयों और विधि समुदाय के सदस्यों से सुझाव एकत्र कर रही है। उन्होंने बताया कि ये सुझाव सुप्रीम कोर्ट रजिस्ट्री को भेज दिए गए हैं और इन्हें समाहित करते हुए एक ढाँचा तैयार किया जाएगा, जिसे सर्वोच्च न्यायालय के विचारार्थ प्रस्तुत किया जाएगा।
मेहता ने यह भी बताया कि पूर्व अंतरिम निर्देशों के उल्लंघन के कुछ मामले प्रकाश में आए हैं, और सुझाव दिया कि ऐसी सामग्री जो प्रतिबंधों का उल्लंघन करते हुए अपलोड की गई है, उसे तत्काल हटाया जाना चाहिए।
अंतरिम प्रतिबंधों की पृष्ठभूमि
गौरतलब है कि सर्वोच्च न्यायालय ने इससे पहले अदालती कार्यवाही की ऑडियो-वीडियो रिकॉर्डिंग को सोशल मीडिया या अन्य डिजिटल प्लेटफॉर्म पर सुप्रीम कोर्ट के महासचिव या संबंधित उच्च न्यायालयों के रजिस्ट्रार जनरल की पूर्व अनुमति के बिना निकालने, प्रसारित करने, मुद्रीकरण करने, पोस्ट करने, पुनः पोस्ट करने, अपलोड करने, प्रसारित करने, संशोधित करने, संग्रहीत करने या होस्ट करने पर पूर्ण अंतरिम प्रतिबंध लगाए थे। न्यायालय ने स्पष्ट किया था कि ये प्रतिबंध मान्यता प्राप्त समाचार माध्यमों की रिपोर्टिंग को बाधित नहीं करेंगे, हालाँकि वे अपनी कवरेज में अदालती कार्यवाही के ऑडियो या वीडियो क्लिप सीधे उपयोग नहीं कर सकते।
तकनीकी उपायों पर विचार-विमर्श
शुक्रवार की सुनवाई के दौरान, सर्वोच्च न्यायालय ने डिजिटल वॉटरमार्किंग, प्रमाणित रिकॉर्डिंग और लाइव-स्ट्रीम की गई न्यायिक कार्यवाही के अनुमत उपयोग से संबंधित दलीलें भी सुनीं। ये उपाय इस बात की निगरानी के लिए महत्वपूर्ण माने जा रहे हैं कि कौन-सी सामग्री किसने और किस उद्देश्य से साझा की।
इस मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने पहले ही सभी उच्च न्यायालयों और प्रमुख सोशल मीडिया मध्यस्थों व प्रौद्योगिकी प्लेटफॉर्म को पक्षकार बनाया है, और उनसे लाइव स्ट्रीमिंग तथा रिकॉर्डिंग के लिए आदर्श नियमों पर सुझाव माँगे हैं।
आगे क्या होगा
केंद्र सरकार को सभी उच्च न्यायालयों और विधि विशेषज्ञों के सुझाव समाहित कर एक समग्र नीतिगत ढाँचा सर्वोच्च न्यायालय के सामने रखना है। अदालत ने यह भी सुनिश्चित करने का निर्देश दिया था कि याचिका में माँगी गई राहतों को लागू करने के लिए जिम्मेदार नोडल मंत्रालयों की पहचान की जाए। यह मामला न्यायिक पारदर्शिता और डिजिटल युग में अदालती कार्यवाही के दुरुपयोग की रोकथाम के बीच संतुलन बनाने की दिशा में एक निर्णायक कदम साबित हो सकता है।