टीएमसी सांसद कीर्ति आजाद का बागियों पर हमला: 'गद्दार' बोले, एनसीपीआई को बताया अपंजीकृत पार्टी
सारांश
मुख्य बातें
तृणमूल कांग्रेस (TMC) के सांसद कीर्ति आजाद ने मंगलवार, 16 जून को उन 20 बागी TMC सांसदों पर कड़ा प्रहार किया, जिन्होंने 'नेशनलिस्ट सिटिज़न्स पार्टी ऑफ इंडिया' (NCPI) का दामन थामा है। आजाद ने इन सांसदों को सार्वजनिक रूप से 'गद्दार' करार दिया और NCPI की कानूनी व संवैधानिक स्थिति पर गंभीर सवाल खड़े किए।
मुख्य घटनाक्रम
कीर्ति आजाद ने स्पष्ट शब्दों में कहा, 'टीएमसी ही असली पार्टी है — दीदी यानी ममता बनर्जी की पार्टी। दूसरा गुट गद्दारों की पार्टी है।' उन्होंने यह भी रेखांकित किया कि NCPI एक गैर-मान्यता प्राप्त और अपंजीकृत दल है, जिसका संसद में एक भी सदस्य नहीं है। उनके अनुसार, 'जिस पार्टी का कोई अस्तित्व ही नहीं, उसमें विलय का कोई राजनीतिक या कानूनी महत्व नहीं है।'
बागी खेमे में आंतरिक कलह
आजाद ने बताया कि बागी गुट में भी एकता नहीं है। उनके अनुसार, इस खेमे में इस बात को लेकर विवाद चल रहा है कि कौन-से दो लोग मंत्री पद पाएँगे और नेतृत्व किसके हाथ में होगा। उन्होंने कहा, 'सांसद कह रहे हैं कि वे अलग गुट बनाएँगे, जबकि विधायक कह रहे हैं कि वे विपक्ष में रहेंगे — इनमें आपस में कोई समन्वय नहीं है।'
काकोली घोष दस्तीदार का ज़िक्र
एक सवाल के जवाब में आजाद ने बागी खेमे की कथित नेता काकोली घोष दस्तीदार का नाम लिया, जिन्हें कथित तौर पर कैमरे पर ₹5 लाख लेते हुए पकड़ा गया था। उन्होंने कहा कि घोष दस्तीदार ने NDA का समर्थन करने और अलग गुट बनाने की बात कही थी, और अब उन्होंने खुद को NCPI में मिला लिया है — जो न तो मान्यता प्राप्त है और न ही संसद में प्रतिनिधित्व रखती है।
भाजपा पर निशाना और राजनीतिक नैतिकता का सवाल
कीर्ति आजाद ने इस पूरे घटनाक्रम को भारतीय जनता पार्टी (BJP) की रणनीति का हिस्सा बताया। उन्होंने आरोप लगाया कि BJP का लक्ष्य किसी तरह 362 का आँकड़ा हासिल करना और परिसीमन (डिलिमिटेशन) विधेयक पास कराना है। उन्होंने कहा कि इसी तर्ज पर महाराष्ट्र में भी 'ऑपरेशन' की बात हो रही है। आजाद ने यह भी कहा कि पिछले 12 वर्षों में राजनीतिक नैतिकता पूरी तरह समाप्त हो चुकी है और अब ऐसे कदम खुलेआम उठाए जाते हैं।
TMC कार्यकर्ताओं का रुख
आजाद ने ज़ोर देकर कहा कि पार्टी के ज़मीनी कार्यकर्ता इस दल-बदल विवाद के बावजूद ममता बनर्जी के साथ मज़बूती से खड़े हैं। उन्होंने इस विलय को 'अलोकतांत्रिक' बताते हुए कहा, 'आम तौर पर विलय जनहित के लिए और किसी सिद्धांत के आधार पर होता है। यहाँ ऐसा कुछ नहीं है — यह केवल निजी स्वार्थ और सत्ता में बने रहने की कोशिश है।' यह घटनाक्रम ऐसे समय में सामने आया है जब पश्चिम बंगाल की राजनीति में TMC के भीतर विभाजन की रेखाएँ गहरी होती दिख रही हैं।