सुहरावर्दी का नाम बदलने पर पवन खेड़ा का तंज: 'हसन और हुसैन में फर्क नहीं जानती BJP'
सारांश
मुख्य बातें
कांग्रेस के वरिष्ठ नेता पवन खेड़ा ने 22 जून 2026 को नई दिल्ली में पश्चिम बंगाल में सुहरावर्दी एवेन्यू का नाम बदलने के केंद्र सरकार के कदम पर तीखा व्यंग्य किया। उन्होंने कहा कि भारतीय जनता पार्टी (BJP) की सरकार को हसन सुहरावर्दी और हुसैन सुहरावर्दी के बीच का बुनियादी फर्क भी नहीं पता, और इस अज्ञानता के आधार पर ऐतिहासिक निर्णय लिए जा रहे हैं।
किस सुहरावर्दी के नाम पर थी सड़क?
खेड़ा ने स्पष्ट किया कि सुहरावर्दी एवेन्यू का नाम हसन सुहरावर्दी के सम्मान में रखा गया था, जो एक प्रतिष्ठित शिक्षाविद्, विद्वान और शोधकर्ता थे। उन्होंने बताया कि नोबेल पुरस्कार विजेता रवींद्रनाथ टैगोर ने हसन सुहरावर्दी को शांति निकेतन में ईरानी अध्ययन, वास्तुकला और संस्कृति पर शोध के लिए विशेष रूप से आमंत्रित किया था। वे रूसी भाषा के भी गहरे जानकार थे।
खेड़ा ने यह भी उल्लेख किया कि जब हसन सुहरावर्दी को कलकत्ता विश्वविद्यालय का पहला मुस्लिम वाइस चांसलर नियुक्त किया गया था, तब श्यामा प्रसाद मुखर्जी और रवींद्रनाथ टैगोर दोनों ने उनका समर्थन किया था। उन्होंने व्यंग्य करते हुए कहा, 'वॉट्सऐप नर्सरी में तो यह ज्ञान आएगा नहीं।'
अयोध्या चंदा विवाद पर हमला
इसी प्रेस वार्ता में खेड़ा ने उत्तर प्रदेश की योगी आदित्यनाथ सरकार पर भी निशाना साधा। उन्होंने आरोप लगाया कि भगवान राम के नाम पर सत्ता हासिल करने के बाद अब अयोध्या में चंदे के दुरुपयोग के मामले सामने आ रहे हैं। उन्होंने कहा कि आरोपों से स्पष्ट होता है कि यह गड़बड़ी सरकार की जानकारी में हुई और इसमें वरिष्ठ अधिकारी भी शामिल हो सकते हैं। कथित तौर पर पूरे मामले की जाँच के लिए SIT गठित की गई है।
खेड़ा ने कहा, 'भगवान राम ने सिद्धांतों के लिए सत्ता छोड़ दी थी और अपनी बात पर कायम रहना उन्हें जान से भी ज्यादा प्रिय था। लेकिन आज उनके नाम पर सत्ता हासिल की जा रही है और चंदे का दुरुपयोग हो रहा है। कम से कम अयोध्या को तो बख्श दें।'
'ऑपरेशन टाइगर' पर कटाक्ष
खेड़ा ने 'ऑपरेशन टाइगर' पर भी व्यंग्यात्मक टिप्पणी की। उन्होंने कहा, 'वैसे भी बाघों की संख्या कम हो रही है, बस थोड़ा इंतजार कीजिए। जो लोग खुद को 'टाइगर' समझते हैं, उनकी संख्या भी कम होगी।' यह टिप्पणी राजनीतिक हलकों में चर्चा का विषय बन गई।
विशेषज्ञ और ऐतिहासिक संदर्भ
गौरतलब है कि हसन सुहरावर्दी और हुसैन शहीद सुहरावर्दी — जिन्हें आलोचक 'बंगाल के दंगों' से जोड़ते हैं — दो बिल्कुल अलग व्यक्तित्व हैं। इतिहासकारों के अनुसार दोनों के बीच भ्रम अक्सर राजनीतिक बहसों में होता है। खेड़ा ने इसी बिंदु को रेखांकित करते हुए कहा कि सरकार को नाम बदलने से पहले यह बुनियादी तथ्य स्थापित करना चाहिए था कि सड़क किस सुहरावर्दी के नाम पर थी। आने वाले दिनों में इस विवाद पर संसद और राज्य विधानसभाओं में भी प्रतिक्रिया देखने को मिल सकती है।