मेघालय में अक्टूबर में 85% कम बारिश, सभी 11 जिलों में जल संकट गहराया
सारांश
मुख्य बातें
मेघालय में अक्टूबर 2026 के दौरान सामान्य 255 मिमी के मुकाबले मात्र 38.3 मिमी वर्षा दर्ज की गई, जो 85 प्रतिशत की भारी कमी है। अधिकारियों ने सोमवार, 2 नवंबर को यह जानकारी देते हुए चेताया कि राज्य के सभी 11 जिलों में पेयजल उपलब्धता और जल सुरक्षा को लेकर गंभीर खतरा उत्पन्न हो गया है।
मानसून के दौरान भी रही भारी कमी
यह स्थिति दक्षिण-पश्चिम मानसून की असाधारण विफलता की पृष्ठभूमि में और भी गंभीर हो गई है। जून से सितंबर के बीच राज्य में सामान्य 2,695.3 मिमी के मुकाबले केवल 1,077.1 मिमी बारिश हुई, जो 60 प्रतिशत की कमी दर्शाती है। मानसून के आगे बढ़ने के साथ यह कमी लगातार बढ़ती गई — जुलाई में 9 प्रतिशत की कमी अगस्त में बढ़कर 38 प्रतिशत हो गई, जब राज्य में सामान्य 581.6 मिमी के मुकाबले मात्र 359.7 मिमी वर्षा दर्ज की गई।
जिलावार स्थिति: सबसे ज़्यादा प्रभावित ज़िले
अक्टूबर में वर्षा की कमी राज्य के सभी जिलों में 74 से 93 प्रतिशत के बीच रही। दक्षिण-पश्चिम गारो हिल्स में सर्वाधिक 93 प्रतिशत की कमी दर्ज की गई। पूर्वी जयंतिया हिल्स और उत्तर गारो हिल्स में 92-92 प्रतिशत तथा पूर्वी खासी हिल्स में 91 प्रतिशत की कमी रही।
पश्चिमी गारो हिल्स में 86 प्रतिशत, दक्षिण-पश्चिम खासी हिल्स और पश्चिमी खासी हिल्स में 84-84 प्रतिशत की कमी आंकी गई। पूर्वी गारो हिल्स में 81 प्रतिशत और पश्चिमी जयंतिया हिल्स में 80 प्रतिशत की कमी रही। अपेक्षाकृत कम प्रभावित री भोई और दक्षिण गारो हिल्स में भी 74-74 प्रतिशत की कमी दर्ज हुई — जो किसी भी मानक पर गंभीर है।
पेयजल संकट और ग्रामीण क्षेत्रों पर असर
लगातार कई महीनों की वर्षा की कमी के कारण ग्रामीण और दूरदराज के इलाकों में पीने के पानी की उपलब्धता को लेकर चिंताएँ तेज़ हो गई हैं, जहाँ स्थानीय आबादी बड़े पैमाने पर प्राकृतिक झरनों पर निर्भर है। मुख्यमंत्री कोनराड के. संगमा ने पहले ही स्वीकार किया है कि 'जल जीवन मिशन' के अंतर्गत कई परियोजनाओं को जल-स्रोतों में कमी, वर्षा के बदलते पैटर्न और बदलती जलवायु परिस्थितियों के चलते आपूर्ति संबंधी चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है।
गौरतलब है कि मेघालय उन भारतीय राज्यों में शामिल है जो परंपरागत रूप से देश के सर्वाधिक वर्षा वाले क्षेत्र माने जाते हैं — चेरापूंजी और मावसिनराम जैसे स्थान यहीं स्थित हैं। ऐसे में 85 प्रतिशत की कमी असाधारण और चिंताजनक है।
सरकार की प्रतिक्रिया और संरक्षण प्रयास
जन स्वास्थ्य अभियांत्रिकी विभाग ने 70,000 से अधिक 'स्प्रिंगशेड' (जल-स्रोत क्षेत्रों) में लगभग 55,000 झरनों की मैपिंग की है और उनके पुनरुद्धार के लिए 785 महत्वपूर्ण जल-स्रोतों की पहचान की है। हालाँकि, इन प्रयासों की वास्तविक प्रभावशीलता मौजूदा संकट की रोशनी में जाँच के दायरे में आ गई है।
आगे क्या होगा
विशेषज्ञों के अनुसार, वर्षा की यह लगातार कमी मेघालय की झरनों पर आधारित जल-प्रणालियों की नाज़ुक स्थिति को उजागर करती है और दीर्घकालिक संरक्षण उपायों की तत्काल आवश्यकता की ओर इशारा करती है। यह ऐसे समय में आया है जब जलवायु परिवर्तन के कारण पूरे पूर्वोत्तर भारत में मानसून के पैटर्न अनिश्चित होते जा रहे हैं। आने वाले महीनों में राज्य सरकार पर वैकल्पिक जल-आपूर्ति व्यवस्था सुनिश्चित करने का दबाव बढ़ने की संभावना है।