चैत्र नवरात्रि: राजस्थान का अनोखा मंदिर, जहां राक्षस को पहले भोग अर्पित किया जाता है
सारांश
Key Takeaways
- राजस्थान के पाली का मां शीतला माता मंदिर अद्भुत परंपराओं का गवाह है।
- आस्था और श्रद्धा के साथ भक्त यहां आते हैं।
- राक्षस को पहले भोग अर्पित करने की अनोखी परंपरा है।
- मंदिर में चमत्कारिक ओखली श्रद्धालुओं को आकर्षित करती है।
- हर साल मेले का आयोजन भक्तों के लिए विशेष अनुभव होता है।
नई दिल्ली, 15 मार्च (राष्ट्र प्रेस)। जैसे ही चैत्र नवरात्रि का पर्व समीप आता है, देवी मंदिरों में धूमधाम शुरू हो जाती है। देश भर के देवी मंदिरों में सजावट का कार्य प्रारंभ हो चुका है और विशेष स्थानों पर मेले की तैयारी जोरों पर है। ऐसा ही एक अनोखा मंदिर राजस्थान में है, जहां मां आज भी एक अहंकारी राक्षस को शांति प्रदान कर रही हैं और भोग भी राक्षस को मां से पहले अर्पित किया जाता है। हम बात कर रहे हैं पाली में स्थित मां शीतला माता मंदिर की, जो चर्म रोगों से राहत के लिए प्रसिद्ध है।
राजस्थान के पाली जिले के भाटुण्ड गांव में स्थित मां शीतला माता का यह प्राचीन मंदिर लगभग 800 वर्ष पुराना माना जाता है। इस मंदिर से जुड़ी कई चमत्कारी कथाएं प्रचलित हैं। मंदिर के गर्भगृह में मां शीतला की चार भुजाओं वाली प्रतिमा है, और इसके सामने एक अद्भुत ओखली स्थित है, जो कई लीटर पानी डालने पर भी नहीं भरती। ओखली की गहराई 1 मीटर है, लेकिन फिर भी यह कई लीटर पानी अपने अंदर समेट लेती है।
मंदिर के पुजारी के अनुसार, जब तक ओखली में दूध की छींटे नहीं पड़ती, तब तक राक्षस का पेट नहीं भरता है और न ही ओखली। स्थानीय किंवदंतियों के अनुसार, जब भी गांव में किसी की शादी होती थी, तब बाबरा नामक राक्षस दूल्हे को मार डालता था। राक्षस के अत्याचार से मुक्ति पाने के लिए गांव के एक ब्राह्मण ने तपस्या की, जिससे माता प्रसन्न हुईं। माता ने ब्राह्मण को आशीर्वाद देकर कहा कि वह अपनी बेटी की शादी करे, और स्वयं आकर राक्षस का संहार करेंगी।
मां शीतला के कहने पर ब्राह्मण ने ऐसा किया और समय पर मां ने बाबरा राक्षस का वध किया। मरने से पूर्व राक्षस ने मां के चरणों में गिरकर माफी मांगी, तब माता ने बाबरा को माफ किया और साल में दो बार उसे पानी पिलाने तथा भोग लगाने का आदेश दिया। इस कारण शीतला सप्तमी और ज्येष्ठ पूर्णिमा को मेला लगता है, जिसमें गांव की सभी महिलाएं घड़ों में पानी भरकर ओखली में डालती हैं, ताकि राक्षस शांत रहे।
चैत्र के महीने में नवरात्रि से पहले ही मेले का आयोजन शुरू हो जाता है, जो कई दिनों तक चलता है। इस दौरान लाखों श्रद्धालु मंदिर की कठिन सीढ़ियों को चढ़कर मां के दर्शन के लिए पहुंचते हैं।