राजस्थान ओबीसी सर्वे रिपोर्ट जारी: 3.63 करोड़ आबादी, जाट-गुर्जर सबसे बड़े समुदाय
सारांश
मुख्य बातें
राजस्थान सरकार ने 10 अगस्त 2026 को आगामी पंचायती राज और शहरी स्थानीय निकाय चुनावों से पहले राजस्थान अन्य पिछड़ा वर्ग (राजनीतिक प्रतिनिधित्व) आयोग की विस्तृत सर्वेक्षण रिपोर्ट सार्वजनिक कर दी है। रिटायर्ड जस्टिस मदनलाल भाटी की अध्यक्षता में तैयार इस रिपोर्ट में 92 ओबीसी समुदायों का सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक विश्लेषण किया गया है, जिसमें 'सबसे पिछड़े वर्गों' (एमबीसी) की श्रेणी के पाँच समुदाय भी शामिल हैं।
आबादी का ढाँचा
रिपोर्ट के अनुसार, राजस्थान में कुल ओबीसी आबादी 3.63 करोड़ से अधिक है। इसमें पुरुष आबादी 1,87,50,094 (52.23 प्रतिशत) और महिला आबादी 1,71,05,082 (47.76 प्रतिशत) है। लिंगानुपात प्रति 1,000 पुरुषों पर 914 महिलाएँ दर्ज किया गया है।
आबादी के हिसाब से शीर्ष सात समुदाय मिलकर कुल ओबीसी जनसंख्या का 55.14 प्रतिशत हिस्सा बनाते हैं। जाट और जाट सिख समुदाय सबसे बड़ा समूह है जिसकी हिस्सेदारी 20.14 प्रतिशत है। इसके बाद गुर्जर (9.11 प्रतिशत), कुम्हार और कुमावत (8.36 प्रतिशत), तथा माली, सैनी और बागवान (7.80 प्रतिशत) आते हैं। जांगिड़/सुथार की हिस्सेदारी 3.49 प्रतिशत, यादव/अहीर की 3.22 प्रतिशत और मेव समुदाय की 3.02 प्रतिशत है।
सरकारी नौकरियों में असमान प्रतिनिधित्व
सर्वे में सरकारी सेवाओं में गहरी असमानता उजागर हुई है। राजस्थान में कुल 3.92 लाख ओबीसी सरकारी कर्मचारी हैं, जिनमें से जाट, गुर्जर, सैनी और यादव समुदाय मिलकर लगभग 78 प्रतिशत हिस्सेदारी रखते हैं। दूसरी ओर, 18 ओबीसी समुदायों में से प्रत्येक के सरकारी सेवा में 100 से भी कम सदस्य हैं।
यह आँकड़ा इस बात को रेखांकित करता है कि ओबीसी श्रेणी के भीतर ही प्रतिनिधित्व की खाई कितनी गहरी है। रिपोर्ट इस बात पर जोर देती है कि जाँच केवल आबादी के आधार पर नहीं, बल्कि सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक भागीदारी के संदर्भ में भी होनी चाहिए।
स्वरोजगार और श्रम भागीदारी
रिपोर्ट के अनुसार, ओबीसी समुदायों के लगभग 12.50 लाख लोग स्वरोजगार में लगे हैं। प्रमुख समुदायों में कुम्हार-कुमावत (1.24 लाख), जाट (1.21 लाख), माली-सैनी (1.15 लाख) और जांगिड़ (85,114) शामिल हैं। दिहाड़ी मजदूरी और श्रम क्षेत्र में भी कुम्हार-कुमावत और सैनी समुदायों की उल्लेखनीय भागीदारी दर्ज की गई है।
सुप्रीम कोर्ट के 'ट्रिपल टेस्ट' से जुड़ाव
यह रिपोर्ट सर्वोच्च न्यायालय के 'ट्रिपल टेस्ट' फ्रेमवर्क के अनुसार तैयार की गई है। आयोग के निष्कर्ष राजस्थान की पंचायती राज संस्थाओं और शहरी स्थानीय निकायों में ओबीसी आरक्षण निर्धारित करने के लिए कानूनी आधार बनाने में सहायक होंगे। गौरतलब है कि सर्वोच्च न्यायालय ने स्थानीय निकाय चुनावों में ओबीसी आरक्षण के लिए अनुभवजन्य डेटा की अनिवार्यता पहले ही स्पष्ट कर दी है।
आगे की राह
अधिकारियों के अनुसार, आयोग के निष्कर्षों का आरक्षण प्रक्रिया और जमीनी स्तर पर समावेशी प्रतिनिधित्व को मजबूत करने पर सीधा असर पड़ेगा। रिपोर्ट यह भी रेखांकित करती है कि जिन समुदायों की राजनीतिक और आर्थिक भागीदारी ऐतिहासिक रूप से कम रही है, उन्हें लक्षित नीतिगत हस्तक्षेप की जरूरत है। अब सरकार के सामने चुनौती यह है कि इस डेटा को समयबद्ध और न्यायसंगत आरक्षण नीति में कैसे बदला जाए।