अमेरिकी सेक्शन 301 टैरिफ के खिलाफ भारत की पलटवार, 8 जुलाई को USTR सुनवाई में CII-FICCI देंगे गवाही
सारांश
मुख्य बातें
भारत सरकार और प्रमुख उद्योग संगठनों ने अमेरिकी व्यापार प्रतिनिधि कार्यालय (USTR) के उस प्रस्ताव के खिलाफ एकजुट मोर्चा खोल दिया है, जिसमें सेक्शन 301 की जांच के तहत भारतीय निर्यात पर 12.5 प्रतिशत की अतिरिक्त आयात शुल्क लगाने की बात कही गई है। सरकारी अधिकारियों और उद्योग जगत का कहना है कि जबरन श्रम (फोर्स्ड लेबर) को लेकर वाशिंगटन के निष्कर्ष कानूनी रूप से कमज़ोर हैं, पर्याप्त साक्ष्यों पर आधारित नहीं हैं, और इनसे दुनिया की सबसे बड़ी तथा पाँचवीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाओं के बीच जुड़ी आपूर्ति श्रृंखलाएँ प्रभावित हो सकती हैं।
8 और 9 जुलाई की सुनवाई: कौन देगा गवाही
8 जुलाई 2026 को USTR की सेक्शन 301 कमेटी के सामने पैनल 8 में फेडरेशन ऑफ इंडियन चैंबर्स ऑफ कॉमर्स एंड इंडस्ट्री (FICCI) की पूर्णिमा शेनॉय और कन्फेडरेशन ऑफ इंडियन इंडस्ट्री (CII) की शुचिता सोनालिका गवाही देंगी। पैनल 9 में वाणिज्य और उद्योग मंत्रालय के डॉ. बृज मोहन और कृषि एवं प्रसंस्कृत खाद्य उत्पाद निर्यात विकास प्राधिकरण (APEDA) के शुभम अरोड़ा भारत का पक्ष रखेंगे। ऑटोमोटिव कंपोनेंट मैन्युफैक्चरर्स एसोसिएशन (ACMA) के महानिदेशक विनी मेहता 9 जुलाई को गवाही देंगे।
भारत सरकार की आधिकारिक आपत्ति
वाणिज्य और उद्योग मंत्रालय ने USTR के निष्कर्षों को सिरे से खारिज किया है। मंत्रालय का कहना है कि भारत में एक सुदृढ़ घरेलू कानूनी ढाँचा मौजूद है, जिसमें कानूनी प्रतिबंध, संस्थागत प्रणालियाँ और जबरन श्रम की कमज़ोरियों को दूर करने के लिए जारी नीतिगत उपाय शामिल हैं। भारत का यह भी तर्क है कि इस बात के पर्याप्त और ठोस साक्ष्य नहीं हैं कि भारत की आयात व्यवस्था अमेरिकी व्यापार पर कोई अनुचित बोझ डालती है — जबकि सेक्शन 301 के तहत कार्रवाई के लिए ऐसे प्रमाण अनिवार्य हैं।
CII और FICCI का कानूनी एवं आर्थिक तर्क
CII ने प्रस्तावित कार्रवाई के खिलाफ विस्तृत कानूनी और आर्थिक दलीलें तैयार की हैं। संगठन का कहना है कि भारत का नीतिगत ढाँचा US ट्रेड एक्ट के सेक्शन 301 के तहत गलत या भेदभावपूर्ण नहीं है। भारत के संवैधानिक सुरक्षा उपाय आर्टिकल 23 में निहित हैं और बॉन्डेड लेबर सिस्टम (उन्मूलन) अधिनियम, बाल श्रम (निषेध एवं विनियमन) संशोधन अधिनियम तथा 2019-2020 के बीच लागू चार श्रम संहिताओं से और मज़बूत हुए हैं।
CII ने USTR की रिपोर्ट में दिए गए उदाहरणों पर भी आपत्ति जताई है। संगठन के अनुसार, भारत ने 2021-2025 की समीक्षा अवधि के दौरान म्यांमार से कोई चावल और मलावी से कोई तंबाकू आयात नहीं किया। साथ ही, भारत ने इसी अवधि में 1.537 अरब अमेरिकी डॉलर का अमेरिकी कॉटन आयात किया — जो चीन से उसके आयात का लगभग दोगुना है। CII का तर्क है कि इससे साफ होता है कि भारत की नीतियाँ अमेरिकी व्यापार पर अनुचित बोझ नहीं डालतीं।
FICCI का कहना है कि अमेरिकी बाज़ार की सेवा करने वाली भारतीय निर्यात आपूर्ति श्रृंखलाएँ पहले से ही ट्रेसेबिलिटी, सप्लायर ड्यू डिलिजेंस, स्वतंत्र ऑडिट और ज़िम्मेदार सोर्सिंग पर आधारित सुगठित अनुपालन ढाँचों के भीतर काम करती हैं। संगठन ने चेताया है कि बड़े पैमाने पर टैरिफ से अमेरिकी व्यवसायों और उपभोक्ताओं की लागत बढ़ेगी और हाल के वर्षों में मज़बूत हुई आपूर्ति श्रृंखलाओं में अनावश्यक बाधा आएगी।
क्षेत्रवार असर: कृषि से ऑटो कंपोनेंट तक
APEDA समिति के सामने भारत के कृषि निर्यात का पक्ष रखने की तैयारी में है। FICCI का कहना है कि भारत का चावल क्षेत्र जबरन श्रम का उपयोग नहीं करता और न ही ऐसे इनपुट आयात करता है। ACMA ने ऑटोमोटिव कंपोनेंट उद्योग को छूट देने की माँग की है, यह तर्क देते हुए कि फोर्जिंग, फाउंड्री और कृषि मशीनरी जैसे क्षेत्र पूँजी-गहन, कौशल-आधारित और वैश्विक रूप से एकीकृत हैं — जहाँ जबरन श्रम का तर्क लागू नहीं होता। संगठन के अनुसार, अतिरिक्त शुल्क से एकीकृत आपूर्ति श्रृंखलाओं में बाधा आएगी और अमेरिकी ऑटोमोटिव उद्योग के लिए सोर्सिंग में अनिश्चितता पैदा होगी।
आगे क्या होगा
USTR की सेक्शन 301 जाँच 60 अर्थव्यवस्थाओं को कवर करती है और इस बात पर केंद्रित है कि क्या देशों ने जबरन श्रम से बने आयात पर प्रभावी कानूनी रोक लगाई है। यह प्रस्ताव अभी सार्वजनिक टिप्पणियों के लिए खुला है और अंतिम निर्णय बाद में लिया जाएगा। CII ने USTR से अपील की है कि वह दंडात्मक टैरिफ की जगह स्थापित भारत-अमेरिका व्यापार नीति मंच के ज़रिए अनुपालन-आधारित सहयोग को प्राथमिकता दे। यह सुनवाई ऐसे समय में हो रही है जब भारत-अमेरिका व्यापार संबंध नए समझौतों की दिशा में बढ़ रहे हैं, और इसका परिणाम दोनों देशों की आपूर्ति श्रृंखलाओं की दिशा तय कर सकता है।