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यूएन महासभा ने 140 मतों से CCIT अपनाने का आग्रह किया, भारत ने दोहरे मानदंडों को नकारा

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यूएन महासभा ने 140 मतों से CCIT अपनाने का आग्रह किया, भारत ने दोहरे मानदंडों को नकारा

सारांश

31 वर्षों से लंबित भारत के CCIT प्रस्ताव को यूएन महासभा ने 140 मतों से समर्थन दिया — लेकिन बाध्यकारी अनुमोदन अभी दूर है। पाकिस्तान जैसे देशों का 'अच्छे-बुरे आतंकवादी' वाला तर्क और अमेरिका की आलोचना बताती है कि वैश्विक आतंकवाद-विरोधी एकजुटता अभी भी राजनीतिक दाँव-पेंच में उलझी है।

मुख्य बातें

यूएन महासभा ने 2 जुलाई 2026 को 140-3 मतों से GCTS की नौवीं समीक्षा पारित कर CCIT अपनाने का आग्रह किया।
भारत ने 31 वर्ष पहले CCIT पेश किया था; यह अभी भी अनुमोदन की प्रतीक्षा में है।
अमेरिका, इज़रायल और अर्जेंटीना ने विरोध में मत दिया; 49 देश अनुपस्थित रहे।
भारतीय प्रतिनिधि पी.
हरीश ने आतंकवाद पर 'दोहरे मानदंडों' और 'अच्छे-बुरे आतंकवादी' के भेद को अस्वीकार्य बताया।
पाकिस्तान और कुछ देशों का विरोध जारी है, जो कुछ आतंकवादियों को 'स्वतंत्रता सेनानी' बताते हैं।
भारत ने यूएन में धार्मिक पूर्वाग्रह के प्रति सार्वभौमिक दृष्टिकोण अपनाने की भी माँग की।

संयुक्त राष्ट्र महासभा ने 2 जुलाई 2026 को 140 मतों के भारी बहुमत से भारत द्वारा प्रस्तावित अंतरराष्ट्रीय आतंकवाद पर व्यापक अभिसमय (CCIT) को अपनाने के लिए सदस्य देशों से 'हरसंभव प्रयास' करने का आग्रह किया। यह प्रस्ताव यूएन वैश्विक आतंकवाद-रोधी रणनीति (GCTS) की नौवीं समीक्षा के अंतर्गत पारित हुआ, जिसके विरोध में केवल तीन मत पड़े।

CCIT क्या है और क्यों है लंबित

भारत ने CCIT को 31 वर्ष पहले संयुक्त राष्ट्र में पेश किया था, किंतु यह अब तक अनुमोदन की प्रतीक्षा में है। इस अभिसमय का उद्देश्य आतंकवाद से जुड़ी कानूनी कमियों को दूर करना, अभियोजन और प्रत्यर्पण की प्रक्रिया को सुदृढ़ करना तथा आतंकवादियों को सुरक्षित पनाहगाहों, धन और हथियारों तक पहुँच से वंचित करना है। संयुक्त राष्ट्र में भारत के स्थायी प्रतिनिधि पी. हरीश ने चेतावनी दी कि 'सार्वभौमिक रूप से स्वीकृत कानूनी ढाँचे' के अभाव ने आतंकवाद के विरुद्ध वैश्विक संघर्ष को कमज़ोर किया है।

भारत का पक्ष: दोहरे मानदंड अस्वीकार्य

हरीश ने स्पष्ट किया कि आतंकवाद का प्रभावी मुकाबला तभी संभव है जब 'दोहरे मानदंड न हों' और 'अच्छे तथा बुरे आतंकवादियों' के बीच कोई भेद न किया जाए। उन्होंने कहा, 'आतंकवाद का कोई औचित्य नहीं हो सकता। किसी भी प्रकार की शिकायत, राजनीतिक उद्देश्य या रणनीतिक गणना के बावजूद आतंकवाद को उसके हर रूप और अभिव्यक्ति में बिना किसी शर्त के निंदा की जानी चाहिए।' उन्होंने यह भी कहा कि आतंकवादी घटनाओं के 'अपराधियों, आयोजकों, वित्तपोषकों और प्रायोजकों' को जवाबदेह ठहराना और न्याय के कटघरे में लाना सभी सदस्य देशों की साझा ज़िम्मेदारी है।

विरोध की राजनीति: पाकिस्तान और अन्य देश

CCIT का विरोध मुख्यतः पाकिस्तान और कुछ अन्य देशों की ओर से होता रहा है, जो आतंकवादियों के बीच भेद करने की कोशिश करते हैं और कुछ को 'स्वतंत्रता सेनानी' का दर्जा देकर आतंकवाद के समर्थन को उचित ठहराने का प्रयास करते हैं। इस बार मतदान में अमेरिका के आग्रह पर वोटिंग कराई गई, जिसने GCTS की समीक्षा को 'अनावश्यक रूप से विस्तृत, पुराना और फोकस से रहित' बताया। इज़रायल और अर्जेंटीना ने अमेरिका के साथ विरोध में मत दिया, जबकि 49 देश अनुपस्थित रहे। जापान ने मतदान में औपचारिक रूप से भाग नहीं लिया, लेकिन बाद में स्पष्ट किया कि यह एक तकनीकी त्रुटि थी और वह दस्तावेज़ का समर्थन करता है।

धार्मिक भेदभाव पर भारत की व्यापक चिंता

हरीश ने पूर्वाग्रह और भेदभाव से निपटने के संयुक्त राष्ट्र के प्रयासों में केवल अब्राहमिक धर्मों पर केंद्रित दृष्टिकोण पर भी आपत्ति जताई। उन्होंने कहा, 'हम इस्लामोफोबिया, ईसाई-विरोध और यहूदी-विरोध से प्रेरित सभी कृत्यों की निंदा करते हैं, लेकिन इस प्रतिष्ठित संस्था को यह भी स्वीकार करना चाहिए कि इस प्रकार के पूर्वाग्रह अन्य धर्मों के प्रति भी मौजूद हैं।' गौरतलब है कि यह GCTS की वह समीक्षा है जो 2006 में महासभा द्वारा पहली बार मंजूरी मिलने के बाद से हर दो वर्ष में होती है और सामान्यतः सर्वसम्मति से अपनाई जाती रही है।

आगे की राह

हरीश ने कहा कि 'अब समय आ गया है कि राजनीतिक इच्छाशक्ति का परिचय देते हुए CCIT को अंतिम रूप दिया जाए।' यह मतदान ऐसे समय में आया है जब वैश्विक आतंकवाद की घटनाएँ बढ़ रही हैं और अंतरराष्ट्रीय सहयोग की माँग पहले से कहीं अधिक प्रबल है। CCIT के अनुमोदन की दिशा में यह बहुमत एक महत्वपूर्ण राजनीतिक संकेत है, भले ही बाध्यकारी समझौते तक पहुँचने की राह अभी लंबी है।

संपादकीय दृष्टिकोण

लेकिन CCIT की असली समस्या संख्या नहीं, राजनीतिक इच्छाशक्ति है — और वह 31 वर्षों में नहीं बदली। जब तक पाकिस्तान जैसे देश 'स्वतंत्रता सेनानी' की आड़ में आतंकवाद को वैध ठहराते रहेंगे और अमेरिका जैसी महाशक्ति GCTS को 'पुराना' कहकर खारिज करती रहेगी, तब तक CCIT एक नैतिक आग्रह से अधिक कुछ नहीं बन पाएगा। भारत का यह मंच महत्वपूर्ण है, लेकिन द्विपक्षीय दबाव और गठबंधन-निर्माण के बिना बहुपक्षीय प्रस्ताव खोखले रह जाते हैं।
RashtraPress
2 जुलाई 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

CCIT (अंतरराष्ट्रीय आतंकवाद पर व्यापक अभिसमय) क्या है?
CCIT भारत द्वारा 31 वर्ष पहले संयुक्त राष्ट्र में प्रस्तुत एक अंतरराष्ट्रीय कानूनी ढाँचा है, जिसका उद्देश्य आतंकवाद की एक सर्वमान्य परिभाषा तय करना, अभियोजन-प्रत्यर्पण प्रक्रिया को मज़बूत करना और आतंकवादियों को वित्त व हथियारों से वंचित करना है। यह अब तक सदस्य देशों के बीच सहमति न बन पाने के कारण लंबित है।
यूएन महासभा में इस बार CCIT पर क्या हुआ?
2 जुलाई 2026 को महासभा ने GCTS की नौवीं समीक्षा 140-3 मतों से पारित की, जिसमें सदस्य देशों से CCIT अपनाने के लिए 'हरसंभव प्रयास' करने का आग्रह किया गया। अमेरिका, इज़रायल और अर्जेंटीना ने विरोध में मत दिया, जबकि 49 देश अनुपस्थित रहे।
CCIT को अपनाने में क्या बाधाएँ हैं?
मुख्य बाधा यह है कि पाकिस्तान सहित कुछ देश आतंकवादियों के बीच भेद करते हैं और कुछ को 'स्वतंत्रता सेनानी' बताकर आतंकवाद के समर्थन को उचित ठहराने की कोशिश करते हैं। इसके अलावा, 'दोहरे मानदंड' वाली राजनीति ने एक सर्वमान्य परिभाषा पर सहमति को रोके रखा है।
भारत के स्थायी प्रतिनिधि पी. हरीश ने क्या कहा?
पी. हरीश ने कहा कि आतंकवाद का कोई औचित्य नहीं हो सकता और इसे हर रूप में बिना शर्त निंदा की जानी चाहिए। उन्होंने अंतरराष्ट्रीय समुदाय से दोहरे मानदंड पूरी तरह खारिज करने और CCIT को तत्काल अंतिम रूप देने की अपील की।
GCTS की समीक्षा में इस बार मतदान क्यों हुआ, जबकि यह सामान्यतः सर्वसम्मति से पारित होती है?
इस बार अमेरिका के आग्रह पर मतदान कराया गया। अमेरिका ने GCTS की समीक्षा को 'अनावश्यक रूप से विस्तृत, पुराना और फोकस से रहित' बताया, जिसके कारण 2006 में इसकी स्थापना के बाद पहली बार सर्वसम्मति टूटी और वोटिंग की नौबत आई।
राष्ट्र प्रेस
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