मेघालय के 'लिविंग रूट ब्रिज': जड़ों से बनती है सदियों पुरानी 'जिंदा इंजीनियरिंग', पद्मश्री हैली वार ने बताई कहानी
सारांश
मुख्य बातें
मेघालय की खासी पहाड़ियों में रबर फिग के पेड़ों की हवाई जड़ों को सावधानीपूर्वक दिशा देकर तैयार किए गए लिविंग रूट ब्रिज — जिन्हें स्थानीय भाषा में 'जिंगकिएंग जरी' कहा जाता है — इंसान और प्रकृति के बीच एक असाधारण और जीवंत संवाद की मिसाल हैं। 22 सितंबर 2026 को पूर्वी खासी हिल्स के सीज गांव में उत्तर प्रदेश के मीडिया प्रतिनिधिमंडल ने 'एक भारत, श्रेष्ठ भारत' कार्यक्रम के तहत पद्मश्री से सम्मानित पर्यावरणविद् हैली वार से सीधी बातचीत की और इस सदियों पुरानी जैव-अभियांत्रिकी परंपरा को करीब से जाना। यह तकनीक आधुनिक निर्माण की गति से भले ही मेल न खाती हो, लेकिन पर्यावरणीय संरक्षण के लिहाज से इसे आज भी अत्यंत प्रासंगिक माना जा रहा है।
जड़ों से पुल कैसे बनता है
खासी समुदाय के लोग रबर फिग के पेड़ की हवाई जड़ों को विशेष दिशा में बढ़ाते हैं — उन्हें सहारा दिया जाता है, आपस में गूंथा जाता है और निरंतर देखभाल की जाती है। हैली वार के अनुसार, वर्षों के इस धैर्यपूर्ण प्रयास के बाद जड़ें एक मजबूत और टिकाऊ पुल का रूप ले लेती हैं। किसी एक पुल को पूरी तरह तैयार होने में वर्षों, और कई बार दशकों तक का समय लग सकता है।
इन पुलों की सबसे विशेष बात यह है कि ये जीवित संरचनाएँ हैं। जहाँ सामान्य पुल समय और मौसम की मार से कमजोर होते जाते हैं, वहीं इन पुलों की जड़ें लगातार बढ़ती और मजबूत होती रहती हैं। इनकी मरम्मत भी इसी प्राकृतिक प्रक्रिया का हिस्सा है — कोई सीमेंट नहीं, कोई सरिया नहीं।
खासी समुदाय की पारंपरिक पर्यावरणीय समझ
हैली वार ने बताया कि खासी समुदाय के लिए जीवित जड़ पुल केवल आवागमन का साधन नहीं हैं। इनके पीछे प्रकृति को समझने, उसके साथ मिलकर काम करने और उसे अगली पीढ़ी के लिए संजोए रखने की गहरी सोच निहित है। पूर्वी खासी हिल्स की भौगोलिक स्थिति, भारी मानसूनी वर्षा और पहाड़ी आवागमन की आवश्यकताओं ने इस अनोखी तकनीक को जन्म दिया।
गौरतलब है कि यहाँ प्रकृति को हटाकर रास्ता बनाने के बजाय प्रकृति को ही रास्ता बनाने के लिए तैयार किया गया। 'जिंगकिएंग जरी' इसलिए केवल पारंपरिक वास्तुकला नहीं, बल्कि जंगल, पेड़, पानी और इंसान के बीच के जीवंत संबंध का दस्तावेज है।
हैली वार का योगदान और पद्मश्री सम्मान
सीज गांव निवासी हैली वार ने दशकों से इस पारंपरिक ज्ञान को संरक्षित करने और नई पीढ़ी तक पहुँचाने का काम किया है। स्थानीय समुदायों को जड़ पुलों की देखभाल, प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण और पारंपरिक ज्ञान से जोड़ना उनके प्रयासों का केंद्रीय हिस्सा रहा है। 2026 में उन्हें पद्म श्री सम्मान से नवाजा गया, जो सामाजिक कार्य, पर्यावरण संरक्षण और खासी समुदाय की जैव-अभियांत्रिकी परंपरा के संरक्षण में उनके अमूल्य योगदान की राष्ट्रीय स्वीकृति है।
किसान के रूप में हैली वार सुपारी, पान, काली मिर्च और विभिन्न फलदार फसलों की खेती करते हैं। खेती और पर्यावरण संरक्षण को साथ लेकर चलने वाली उनकी जीवनशैली यह सिद्ध करती है कि ग्रामीण और आदिवासी समुदायों का पारंपरिक ज्ञान आधुनिक पर्यावरणीय चुनौतियों के बीच भी उतना ही उपयोगी है।
पर्यटन से परे: वैश्विक महत्व
चेरापूंजी, नोंग्रियात और खासी पहाड़ियों के कई क्षेत्रों में मौजूद जीवित जड़ पुल देश-विदेश के पर्यटकों और शोधकर्ताओं के लिए आकर्षण का केंद्र बन चुके हैं। लेकिन इनका महत्व केवल पर्यटन तक सीमित नहीं है — ये पुल स्थानीय समुदायों की सामूहिक मेहनत और पीढ़ी-दर-पीढ़ी हस्तांतरित ज्ञान के जीवंत प्रमाण हैं।
यह ऐसे समय में और भी महत्वपूर्ण हो जाता है जब जलवायु परिवर्तन की चुनौतियों के बीच टिकाऊ और प्रकृति-अनुकूल निर्माण की वैश्विक माँग बढ़ रही है। हैली वार से बातचीत का सबसे अहम संदेश यही रहा कि विकास और प्रकृति को हमेशा आमने-सामने खड़ा करना ज़रूरी नहीं — मेघालय के ये जीवित पुल उसी सोच की सबसे ठोस मिसाल हैं।